ममता बनर्जी बचा पाएंगी अपना किला? बंगाल में कैसे बढ़ती गई BJP, SIR ने भी बदले समीकरण
हैरान करने वाली बात यह है कि वोटर लिस्ट से लाखों नाम हटने के बावजूद मतदान का प्रतिशत बहुत ऊंचा रहा। पहले चरण में लगभग 93 प्रतिशत और दूसरे चरण में करीब 90 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया।

पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से ही अपने तीखे तेवरों और चुनावी हिंसा के लिए जानी जाती रही है। साल 2026 का विधानसभा चुनाव भी इससे अलग नहीं है। 294 सीटों वाली विधानसभा के लिए दो चरणों (23 और 29 अप्रैल) में हुए मतदान के बाद अब सबकी नजरें चुनावी नतीजों पर टिकी हैं। लेकिन इस बार का चुनाव केवल तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सीधी जंग भर नहीं है। इसके पीछे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और राज्य की बदलती जनसांख्यिकी के गहरे राजनीतिक मायने छिपे हुए हैं।
आइए 10 बिंदुओं में समझते है भाजपा-टीमसी की लड़ाई
1. वोटर लिस्ट का सबसे बड़ा विवाद
इस चुनाव का सबसे बड़ा और विवादित मुद्दा एसआईआर रहा है। चुनाव से ठीक पहले चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में एक बहुत बड़ा बदलाव किया। इस प्रक्रिया के तहत लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। यह राज्य के कुल मतदाताओं का करीब 12 प्रतिशत है।
2. चुनाव आयोग और सरकार के अपने-अपने तर्क
चुनाव आयोग का कहना है कि ये नाम फर्जी, मृत या काफी समय से अनुपस्थित रहने वाले मतदाताओं के थे। उन्हें हटाना निष्पक्ष चुनाव के लिए बहुत जरूरी था। दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे भाजपा की एक बड़ी साजिश करार दिया। उनका आरोप है कि भाजपा ने जानबूझकर उन मतदाताओं के नाम कटवाए हैं जो पारंपरिक रूप से टीएमसी के समर्थक माने जाते हैं।
3. अल्पसंख्यक और सीमावर्ती क्षेत्रों में भारी असर
इस वोटर लिस्ट रिवीजन का सबसे ज्यादा असर मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर व दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में देखा गया। इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता रहते हैं। ममता बनर्जी का कहना है कि इन इलाकों में उनके कोर वोट बैंक को निशाना बनाया गया है ताकि भाजपा को सीधा चुनावी फायदा मिल सके।
4. मतदान का रिकॉर्ड प्रतिशत
हैरान करने वाली बात यह है कि वोटर लिस्ट से लाखों नाम हटने के बावजूद मतदान का प्रतिशत बहुत ऊंचा रहा। पहले चरण में लगभग 93 प्रतिशत और दूसरे चरण में करीब 90 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक प्रकार का 'सांख्यिकीय जादू' है। जब कुल मतदाताओं की संख्या कम हो जाती है (7.66 करोड़ से घटकर 6.82 करोड़), तो मतदान का प्रतिशत अपने आप बढ़ा हुआ दिखाई देता है।
5. क्या यह सत्ता विरोधी लहर है?
बंगाल में इतने भारी मतदान को लेकर विश्लेषक बंटे हुए हैं। कुछ का मानना है कि जब भी बहुत अधिक मतदान होता है, तो वह सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ जनता के गुस्से यानी सत्ता विरोधी लहर को दर्शाता है। वहीं टीएमसी का दावा है कि उनकी कल्याणकारी योजनाओं जैसे 'लक्ष्मी भंडार' के कारण महिलाएं और गरीब तबका बड़ी संख्या में उनका समर्थन करने बाहर निकला।
6. उत्तर बंगाल बनाम दक्षिण बंगाल का चुनावी नक्शा
बंगाल की राजनीति हमेशा से दो भागों में बंटी रही है। उत्तर बंगाल (जिसमें जलपाईगुड़ी, कूचबिहार और दार्जिलिंग शामिल हैं) में भाजपा ने 2019 के बाद से अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। वहीं दक्षिण बंगाल और कोलकाता के आसपास के इलाके ममता बनर्जी का सबसे मजबूत गढ़ रहे हैं। भाजपा इस बार दक्षिण बंगाल में सेंध लगाने के लिए पूरी ताकत झोंक चुकी है।
7. मतुआ समुदाय और नागरिकता का मुद्दा
दक्षिण बंगाल के नदिया और उत्तर 24 परगना जिलों में मतुआ समुदाय की अच्छी खासी आबादी है। इस समुदाय के वोटों को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा ने सीएए (CAA) यानी नागरिकता संशोधन कानून के वादों का जमकर प्रचार किया है। यदि भाजपा यहां टीएमसी के वोट बैंक में दरार डालने में सफल होती है, तो ममता बनर्जी के लिए सत्ता में वापसी की राह बहुत मुश्किल हो जाएगी।
8. भ्रष्टाचार के आरोप और जांच एजेंसियों का दबाव
पिछले कुछ वर्षों में टीएमसी के कई बड़े नेता और मंत्री भ्रष्टाचार के मामलों में जेल जा चुके हैं। केंद्रीय जांच एजेंसियों (ED और CBI) की लगातार कार्रवाई ने टीएमसी की छवि को नुकसान पहुंचाया है। भाजपा ने अपने प्रचार अभियान में भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाया, जिससे आम जनता के एक बड़े वर्ग में नाराजगी देखने को मिली है।
9. एग्जिट पोल की अनिश्चितता
पश्चिम बंगाल में चुनाव पूर्व अनुमान और एग्जिट पोल अक्सर गलत साबित होते रहे हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में भी कई एजेंसियों ने भाजपा की जीत का अनुमान लगाया था, लेकिन ममता बनर्जी ने 215 सीटें जीतकर सबको हैरान कर दिया था। इस बार भी सर्वे बंटे हुए हैं। कुछ सर्वे भाजपा को बहुमत के करीब दिखा रहे हैं, तो कुछ टीएमसी को हल्की बढ़त दे रहे हैं। कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि इस बार 'त्रिशंकु विधानसभा' की स्थिति बन सकती है, जहां किसी को स्पष्ट बहुमत न मिले।
10. क्या ममता बनर्जी अपना किला बचा पाएंगी?
2026 का यह चुनाव ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन की अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा है। एक तरफ उन पर भ्रष्टाचार के आरोपों और शासन विरोधी लहर का दबाव है, तो दूसरी तरफ भाजपा का बेहद संगठित और आक्रामक प्रचार तंत्र है। यह चुनाव केवल यह तय नहीं करेगा कि बंगाल का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि क्या भाजपा बंगाल की राजनीति में अपनी स्थाई जगह बनाने में कामयाब हो गई है।
किस राज्य में किसकी सरकार? 🤔




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