जब गिरवी रखा गया भारत का कई टन सोना, 2 देशों से लिया था लोन; आज गोल्ड से इतना खौफ क्यों
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोने का खरीदार है। भारत के कुल आयात बिल में सोने की हिस्सेदारी करीब नौ फीसदी है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान सोना आयात 24 प्रतिशत से अधिक बढ़कर रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर (6 लाख करोड़ रुपये से अधिक) पर पहुंच गया।

कच्चे तेल के बाद सोना भारत के लिए दूसरा सबसे बड़ा आयातित उत्पाद बन चुका है। इस पर भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च हो रही है। इसी के चलते यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनता जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से लोगों से गैर-जरूरी सोना खरीद टालने की अपील को भी इसी आर्थिक दबाव से जोड़कर देखा जा रहा है। इससे पहले की सरकारों ने भी सोने के आयात से पैदा हुए संकट को टालने के लिए कई एहतियाती कदम उठाने पड़े थे।
दूसरा सबसे बड़ा खरीदार
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोने का खरीदार है। भारत के कुल आयात बिल में सोने की हिस्सेदारी करीब नौ फीसदी है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान सोना आयात 24 प्रतिशत से अधिक बढ़कर रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर (6 लाख करोड़ रुपये से अधिक) पर पहुंच गया। यह 2024-25 में 58 अरब डॉलर पर था। मात्रा के हिसाब से आयात 2025-26 में 4.76 प्रतिशत घटकर 721.03 टन रह गया, जो 2024-25 में 757.09 टन था।
चूंकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में तेज उछाल आया है, इसलिए मात्रा घटने के बावजूद सोने के आयात पर अधिक भुगतान करना पड़ा। हालांकि, कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी के चलते अप्रैल 2026 में सोने के आयात में तेज गिरावट आई और यह घटकर 15 टन पर आ गया, 30 साल का निचला स्तर है।
1968: गोल्ड कंट्रोल एक्ट
1960 के दशक के आखिर में भारत गंभीर विदेशी मुद्रा संकट और खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने 1968 में गोल्ड कंट्रोल एक्ट लागू किया। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा बचाना और सोने की बढ़ती मांग को नियंत्रित करना था। इसके तहत नागरिकों को सोने की छड़ें या सिक्के रखने पर बैन लगा दिया गया। सोना केवल आभूषण के रूप में रखने की अनुमति थी। साथ ही सुनारों के लिए सख्त नियम बनाए।
2013 : पी. चिदंबरम ने भी की थी अपील
वर्ष 2013 में डॉलर की मांग तेजी से बढ़ रही थी और भारतीय रुपया तेजी से कमजोर हो गया था। लेकिन भारतीय लोग रिकॉर्ड मात्रा में सोना खरीद रहे थे। उस दौरान देश का चालू खाता घाटा भी काफी बढ़ गया था। ऐसे में जून 2013 को तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिंदबरम में लोगों से छह महीने से एकसाल तक सोना न खरीदने का आग्रह किया था।
1991: गिरवी रखना पड़ा सोना
भारत के आर्थिक इतिहास का सबसे बड़ा संकट 1990-91 में आया। उस समय देश के पास केवल कुछ सप्ताह का आयात बिल चुकाने लायक विदेशी मुद्रा बची थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार ने देश को दिवालिया होने से बचाने के लिए आरबीआई के माध्यम से देश का सोना विदेशों में गिरवी रखकर कर्ज लिया। गुप्त रूप से 47 से 67 टन सोना स्विट्जरलैंड और इंग्लैंड में गिरवी रखा गया। इसे लेकर सरकार की खूब किरकिरी हुई थी।
दूसरे देश भी लगा चुके हैं नियंत्रण
चीन : चीन में सोने के आयात पर केंद्रीय बैंक का कड़ा नियंत्रण है। आयात के लिए विशेष लाइसेंस और कोटा जरूरी होता है।
तुर्की : तुर्की ने बढ़ते व्यापार घाटे को कम करने के लिए सोने के आयात पर कोटा लगाया हुआ है।
अमेरिका : अगस्त 1971 को अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर को सोने में बदलने की सुविधा बंद कर दी, आयात पर 10% अधिभार लगाया था।
चिंता का कारण क्यों बनी पीली धातु
दरअसल, सरकार की चिंता सोना नहीं बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार है। सोने के आयात के लिए भारी मात्रा में डॉलर खर्च होते हैं, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आता है। जब सोने का आयात बढ़ता है, तो देश से बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर जाती है। इससे व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा बढ़ जाता है। इसका सीधा असर रुपये पर पड़ता है। डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होने लगता है। रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है।




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