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जिहादी ड्रग क्या है? जिसे खाकर 'लड़ाकू मशीन' बन जाते है आतंकी, भारत में पहली बार पकड़ाई

केंद्र सरकार नशामुक्त भारत अभियान चला रही है। इसी के तहत NCB ने एक विशेष और गुप्त अभियान 'ऑपरेशन रेजपिल' चलाया था। इस ऑपरेशन के तहत एजेंसियों ने 182 करोड़ रुपये मूल्य का सिंथेटिक ड्रग 'कैप्टागन' जब्त किया है।

Sat, 16 May 2026 09:36 PMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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जिहादी ड्रग क्या है? जिसे खाकर 'लड़ाकू मशीन' बन जाते है आतंकी, भारत में पहली बार पकड़ाई

भारत को अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी और आतंकवादी फंडिंग के खिलाफ बड़ी सफलता मिली है। देश के इतिहास में पहली बार नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने बेहद खतरनाक मादक पदार्थ ‘कैप्टागन’ की बड़ी खेप बरामद की है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि ‘ऑपरेशन रेजपिल’ के तहत करीब 182 करोड़ रुपये मूल्य की इस ड्रग खेप को जब्त किया गया। कैप्टागन को आतंकी संगठनों और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क्स में जिहादी ड्रग के तौर पर भी जाना जाता है।

पूरा मामला क्या है?

केंद्र की मोदी सरकार लंबे समय से 'नशामुक्त भारत' अभियान चला रही है। इसी के तहत NCB ने एक विशेष और गुप्त अभियान 'ऑपरेशन रेजपिल' चलाया था। इस ऑपरेशन के तहत एजेंसियों ने 182 करोड़ रुपये मूल्य का सिंथेटिक ड्रग 'कैप्टागन' जब्त किया है। भारत के भीतर इस विशिष्ट ड्रग की यह अब तक की पहली जब्ती है।

कहां जाना था: खुफिया जानकारी के अनुसार, यह खेप भारत में खपत के लिए नहीं थी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्कर भारतीय क्षेत्र का इस्तेमाल एक 'ट्रांजिट रूट' के तौर पर कर रहे थे। इस खेप को यहां से मध्य पूर्व के देशों में भेजा जाना था।

इस मामले में एक विदेशी नागरिक को गिरफ्तार किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्री ने स्पष्ट किया है कि भारत में घुसने वाले या भारत को ट्रांजिट रूट बनाने वाले ड्रग्स के एक-एक ग्राम पर सख्ती से शिकंजा कसा जाएगा।

कैप्टागन क्या है?

कैप्टागन (Captagon) एक सिंथेटिक उत्तेजक ड्रग है, जो मुख्य रूप से एम्फैटेमिन फैमिली का हिस्सा है। यह सीधे इंसान के सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर हमला करता है। इसे लेने के बाद व्यक्ति की नींद, थकान और भूख पूरी तरह खत्म हो जाती है। यह मस्तिष्क में डोपामाइन का स्तर तेजी से बढ़ाता है, जिससे असीम ऊर्जा और यूफोरिया (अत्यधिक खुशी या उग्रता) का अहसास होता है।

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इसे 'जिहादी ड्रग' क्यों कहा जाता है?

इस ड्रग का सबसे ज्यादा कुख्यात इस्तेमाल सीरिया और मध्य पूर्व में सक्रिय आतंकी संगठनों, विशेषकर ISIS (इस्लामिक स्टेट) द्वारा किया गया है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं।

लड़ाकों को मशीन बनाना: युद्ध के मैदान में आतंकी इसे 'एनर्जी पिल' के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इसे खाने के बाद लड़ाके कई दिनों तक बिना सोए, बिना खाए और बिना थके लड़ सकते हैं। यह ड्रग उनके अंदर से दर्द, दया और डर का अहसास खत्म कर देता है, जिससे वे खूंखार होकर बर्बर घटनाओं को अंजाम देते हैं।

टेरर फाइनेंसिंग (आतंकी फंडिंग): यह ड्रग केवल युद्ध के मोर्चे पर ही नहीं खपाया जाता, बल्कि इसकी अवैध बिक्री का पैसा (अरबों डॉलर का काला बाजार) आतंकी संगठनों के लिए हथियारों की खरीद और गतिविधियों की फंडिंग का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है।

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क्या है इस ड्रग का इतिहास?

कैप्टागन कोई नया केमिकल नहीं है। इसे पहली बार 1961 में 'फेनेथाइलिन' नाम से एक वैध दवा के रूप में विकसित किया गया था। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से नार्कोलेप्सी (नींद की बीमारी), डिप्रेशन और बच्चों में ध्यान केंद्रित न कर पाने की बीमारी (ADHD) के इलाज के लिए किया जाता था।

इसके फायदों से ज्यादा इसके नुकसान सामने आने लगे। यह अत्यधिक लत लगाने वाला और हिंसक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाला साबित हुआ। इसे देखते हुए 1986 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य वैश्विक संस्थाओं ने इसे पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया।

वर्तमान स्थिति (सीरियाई गृहयुद्ध से वापसी)

प्रतिबंध के बाद पश्चिमी देशों में इसका चलन खत्म हो गया, लेकिन इसका अवैध निर्माण शुरू हो गया। 2011 में शुरू हुए सीरियाई गृहयुद्ध के दौरान इसकी मांग में बेतहाशा वृद्धि हुई। आज सीरिया और लेबनान के कुछ हिस्से इसका सबसे बड़ा अवैध उत्पादक केंद्र बन चुके हैं, जहां से इसे खाड़ी देशों (मुख्यतः सऊदी अरब) में अवैध रूप से सप्लाई किया जाता है।

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भारत के लिए इस जब्ती के मायने

भारत के लिए यह 'ऑपरेशन रेजपिल' एक ऐतिहासिक सफलता है। चूंकि इस ड्रग का सीधा संबंध अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से है, इसलिए भारत ने इसे पकड़कर न सिर्फ एक बड़े ड्रग सिंडिकेट की कमर तोड़ी है, बल्कि वैश्विक टेरर फंडिंग के एक संभावित नेक्सस को भी बड़ा झटका दिया है। यह इस बात का सख्त संदेश है कि भारत की सुरक्षा एजेंसियां देश की धरती का इस्तेमाल वैश्विक अपराधों के ट्रांजिट हब के रूप में नहीं होने देंगी।