सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बिगाड़ा खेल! अचानक भारत क्यों पहुंचे ट्रंप के मंत्री? ट्रेड डील अटकी
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के ग्लोबल टैरिफ को रद्द करने के तुरंत बाद, US वाणिज्य सचिव ने भारत का अचानक दौरा किया। गोयल के साथ उनकी इस अहम मुलाकात और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर इसके प्रभाव के बारे में विस्तार से पढ़ें।

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापक वैश्विक टैरिफ के फैसले को अमान्य घोषित किए जाने के कुछ ही दिनों बाद, अमेरिकी वाणिज्य सचिव (वाणिज्य मंत्री) हॉवर्ड लुटनिक ने नई दिल्ली का अचानक दौरा किया। गुरुवार को उन्होंने भारतीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के साथ लंच पर मीटिंग की। इस बैठक का मुख्य फोकस दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना था।
आधिकारिक बयान और मुलाकात की पुष्टि
भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और मंत्री पीयूष गोयल दोनों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर इस मुलाकात की पुष्टि की। सर्जियो गोर ने तीनों की एक तस्वीर शेयर करते हुए लिखा- हॉवर्ड लुटनिक और पीयूष गोयल के साथ एक बेहद शानदार लंच। हमारे दोनों राष्ट्रों के लिए सहयोग के ढेरों क्षेत्र मौजूद हैं! पीयूष गोयल ने बताया कि उन्होंने व्यापार और आर्थिक साझेदारी को विस्तार देने के लिए बहुत ही फलदायी चर्चा की है।
अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने 'HT' को दिए गए एक बयान में कहा कि दोनों पक्षों ने अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक और आर्थिक संबंधों को गहरा करने के तरीकों पर चर्चा की। भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस पर तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
निजी दौरा
आधिकारिक मुलाकात के बाद लुटनिक जोधपुर के लिए रवाना हो गए। सूत्रों के अनुसार, वे वहां टेक एग्जीक्यूटिव निकेश अरोड़ा की बेटी आयशा अरोड़ा और आइस हॉकी स्टार जैक ह्यूजेस की शादी में शामिल होने गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और नए टैरिफ नियम
यह बैठक भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों के लिहाज से एक बेहद नाजुक समय पर हुई है। 20 फरवरी को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट' के तहत आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल करके लगाए गए राष्ट्रपति ट्रंप के व्यापक टैरिफ को रद्द कर दिया था। इससे प्रशासन को अन्य कानूनी विकल्पों का सहारा लेने पर मजबूर होना पड़ा।
इसके जवाब में, ट्रंप ने '1974 के व्यापार अधिनियम' की धारा 122 का इस्तेमाल करते हुए सभी पर 10% का नया वैश्विक टैरिफ लगा दिया है। उन्होंने यह भी घोषणा की कि वह इसे बढ़ाकर 15% की वैधानिक सीमा तक ले जाएंगे। फिलहाल, सभी व्यापारिक साझेदारों पर 150 दिनों के लिए 10% का टैरिफ लागू है, जो मौजूदा MFN दरों के अतिरिक्त है।
भारत-अमेरिका द्विपक्षीय समझौते पर प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापारिक बातचीत की पूरी समय-सीमा को बदल कर रख दिया है। भारत के मुख्य वार्ताकार दर्पण जैन और उनकी टीम को 6 फरवरी के संयुक्त बयान के आधार पर एक 'अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते' को अंतिम रूप देने के लिए 23 फरवरी से वाशिंगटन जाना था।
क्या था पुराना समझौता?
6 फरवरी के बयान में यह तय हुआ था कि अमेरिका भारत पर लगाए गए अपने अतिरिक्त टैरिफ (जो दंडात्मक शुल्कों को मिलाकर 50% तक पहुंच गया था) को घटाकर 18% कर देगा। इसके बदले में, भारत रूसी कच्चे तेल की अपनी खरीद को सीमित करेगा और कुछ विशेष अमेरिकी सामानों को भारतीय बाजार में प्राथमिकता देगा।
फिलहाल यह दौरा स्थगित कर दिया गया है क्योंकि दोनों देशों को अदालत के फैसले और इसके निहितार्थ का मूल्यांकन करने के लिए समय चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने संयुक्त बयान में अब बदलाव करना होगा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने देश-विशिष्ट टैरिफ ढांचे को अमान्य कर दिया है और उसकी जगह सभी देशों के लिए एक समान टैरिफ नीति लागू हो गई है।
संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ और 'रस्तोगी चैंबर्स' के संस्थापक अभिषेक रस्तोगी के अनुसार, टैरिफ पर भारत-अमेरिका की कोई भी द्विपक्षीय व्यवस्था अब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही होनी चाहिए। उन्होंने कहा- टैरिफ दरों पर सहमत होने का कार्यपालिका (राष्ट्रपति/प्रशासन) का अधिकार निरंकुश नहीं है; यह न्यायिक रूप से लागू करने योग्य संवैधानिक सीमाओं के अधीन है। कोई भी टैरिफ प्रतिबद्धता जो वैधानिक शक्तियों को पार करती है या संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करती है, वह कानूनी रूप से टिक नहीं पाएगी और उसे रद्द किया जा सकता है। रस्तोगी ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी संवैधानिक ढांचे के तहत, टैरिफ तय करने का अधिकार कांग्रेस (संसद) के पास है, न कि कार्यपालिका के पास।




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