ugc rules 2026 explained why general castes fire on section 3 c of these rules Explainer: यूजीसी रूल्स के सेक्शन 3 (C) में ऐसा क्या, जिसने सवर्णों में ला दिया उबाल, India News in Hindi - Hindustan
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Explainer: यूजीसी रूल्स के सेक्शन 3 (C) में ऐसा क्या, जिसने सवर्णों में ला दिया उबाल

इन रूल्स के सेक्शन 3 (C) में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा बताई गई है। इसमें लिखा गया है- 'जाति-आधारित भेदभाव' का अर्थ अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव है।' इसी को लेकर आपत्ति जताई जा रही है।

Tue, 27 Jan 2026 02:14 PMSurya Prakash लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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Explainer: यूजीसी रूल्स के सेक्शन 3 (C) में ऐसा क्या, जिसने सवर्णों में ला दिया उबाल

यूजीसी रूल्स 2026 को 15 जनवरी से लागू कर दिया गया है। इसे देश के सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू किया गया है। इसके तहत प्रावधान बताए गए हैं कि कैसे समान अवसर आयोगों का हर संस्थानों में गठन किया जाए। इसके तहत अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों से भेदभाव को रोकने की बात कही गई है। इन रूल्स के सेक्शन 3 (C) में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा बताई गई है। इसमें लिखा गया है- 'जाति-आधारित भेदभाव' का अर्थ अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव है।' इसी को लेकर आपत्ति जताई जा रही है।

सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों का कहना है कि इस तरह यूजीसी ने एससी, एसटी और ओबीसी को तो किसी भी तरह के भेदभाव से बचाव का रास्ता दिया है, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए कुछ नहीं कहा गया है। इसके अतिरिक्त आपत्ति इस बात पर भी है कि यदि शिकायत गलत पाई जाती है तो फिर झूठी रिपोर्ट करने वाले के खिलाफ किसी तरह के ऐक्शन का प्रावधान नहीं है। ऐसे में चिंता जाहिर की जा रही है कि यदि झूठी शिकायत पर ऐक्शन का प्रावधान नहीं होगा तो झूठी शिकायतों के मामले बढ़ जाएंगे और सामान्य वर्ग के छात्रों को परेशान करने का यह उपकरण बन जाएगा।

नए नियम के तहत सभी संस्थानों को समान अवसर केंद्र का गठन करना होगा। इसके अलावा एक समता हेल्पलाइन भी बनानी होगी, जिस पर कभी भी कोई शिकायत कर सकता है। इसके अलावा जांच कमेटी गठित करने और यदि संज्ञेय अपराध हो तो पुलिस तक को मामला सौंपे जाने की बात कही गई है। इसको लेकर भी आपत्ति है कि आखिर विश्वविद्यालय कैंपसों में पुलिस की एंट्री कैसे हो सकती है। यहां सेक्शन (E) को पढ़ना भी महत्वपूर्ण है। इसमें भेदभाव की परिभाषा दी गई है।

भेदभाव की यूजीसी रूल्स में क्या बताई गई परिभाषा

इस सेक्शन में लिखा गया है- ‘भेदभाव का अर्थ धर्म, नस्ल, जाति,लिंग, जन्म-स्थान, दिव्यांगता या इनमें से किसी एक के आधार पर किसी भी हितधारक के विरुद्ध कोई भी अनुचित, भेदभावपूर्ण या पक्षपातपूर्ण व्यवहार या ऐसा कोई कार्य, चाहे वह स्पष्ट हो या अंतर्निहित हो। इसमें ऐसा कोई भी विभेद, वहिष्करण, प्रतिबंध या पक्षपात भी शामिल है जिसका उद्देश्य या प्रभाव शिक्षा में समान व्यवहार को निष्प्रभावी या अक्षम करना है और विशेष रूप से, किसी भी हितधारक या हितधारकों के समूह पर ऐसी शर्तें लगाना है जो मानवीय गरिमा के प्रतिकूल हों।’

एक मांग यह भी- सवर्णों को भी मिले भेदभाव पर शिकायत का मौका

कुछ सवर्ण संगठनों की मांग यह भी है कि आखिर सामान्य वर्ग के लोगों को भी इस कानून के तहत संरक्षण क्यों नहीं दिया जा सकता। इन लोगों की दलील है कि जैसे एससी, एसटी और ओबीसी के छात्र भेदभाव का शिकार हो सकते हैं, वैसे ही सवर्ण छात्र भी हो सकते हैं। ऐसे में उन्हें भी अपने खिलाफ होने वाले भेदभाव पर शिकायत करने का वैसा ही अधिकार मिले। इसके अतिरिक्त झूठी शिकायतों के मामले में शिकायत करने वाले के खिलाफ जुर्माने या अन्य कार्रवाई के प्रावधान की भी मांग हो रही है। इस तरह जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर जो प्रावधान है, उस पर ही सवर्णों के एक वर्ग को बड़ी आपत्ति है।