सनातन का श्राप या जनता का गुस्सा? DMK के 'युवराज' उदयनिधि का भी टूट सकता है घमंड
तमिलनाडु चुनाव नतीजों में DMK को करारा झटका लगा है। 'सनातन धर्म' पर विवादित बयान देने वाले उदयनिधि स्टालिन और सीएम एमके स्टालिन अपनी-अपनी सीटों से पीछे चल रहे हैं। क्या थलापति विजय की आंधी ने तोड़ दिया डीएमके का घमंड?

राजनीति में एक पुरानी कहावत है- सत्ता का नशा जब सिर चढ़कर बोलता है, तो जनता बैलेट पेपर (या ईवीएम) से उसका सटीक इलाज करती है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के जो ताजा रुझान और आंकड़े सामने आ रहे हैं, वो सिर्फ एक चुनावी हार नहीं हैं, बल्कि देश की सबसे पुरानी और मजबूत राजनीतिक पार्टियों में से एक 'द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम' (DMK) के लिए एक ऐसा सियासी भूकंप हैं, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी।
राज्य के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन खुद अपनी सीट से 2277 वोटों से पीछे चल रहे हैं, तो वहीं उनके बेटे, जिन्हें डीएमके का 'भविष्य' और 'युवराज' कहा जाता है, उदयनिधि स्टालिन भी चेपॉक जैसी अपनी सुरक्षित और पारिवारिक सीट से पिछड़ गए हैं। आइए समझते हैं कि आखिर तमिलनाडु में डीएमके के इस 'घमंड' के टूटने की पूरी कहानी क्या है और इसके पीछे के मुख्य कारण क्या हैं।
आंकड़ों की गवाही: DMK का किला कैसे ढहा?
अगर हम ताजा चुनावी रुझानों (211 सीटों के आंकड़े) पर नजर डालें, तो तस्वीर डीएमके के लिए डरावनी है।
थलापति विजय का जादू (TVK): सबसे बड़ा उलटफेर तमिल सिनेमा के सुपरस्टार थलापति विजय की नई पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) ने किया है। यह पार्टी 98 सीटों पर आगे चलकर सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार बन गई है।
AIADMK की वापसी: मुख्य विपक्षी पार्टी AIADMK 61 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर मजबूत खड़ी है।
DMK का पतन: सत्ताधारी DMK मात्र 35 सीटों पर सिमटती दिख रही है।
अन्य में पीएमके (6), कांग्रेस (3) और बीजेपी (1) सीट पर आगे है।
ये आंकड़े चीख-चीख कर कह रहे हैं कि तमिलनाडु की जनता ने सत्ताधारी डीएमके को पूरी तरह से नकार दिया है।
'सनातन' का श्राप या सत्ता का अहंकार?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि ऐसा क्या हुआ कि पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने वाले स्टालिन परिवार को जनता ने इस कदर खारिज कर दिया? इसका सबसे बड़ा सिरा जुड़ता है 'सनातन धर्म' पर उदयनिधि स्टालिन के उस विवादित बयान से, जिसने पूरे देश में भूचाल ला दिया था।
सितंबर 2023 में उदयनिधि स्टालिन ने भरे मंच से कहा था कि, 'सनातन धर्म का सिर्फ विरोध नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसे डेंगू, मलेरिया और कोरोना की तरह जड़ से खत्म कर देना चाहिए।'
इस बयान के बाद जब पूरे देश में हंगामा मचा, तो एक जिम्मेदार नेता की तरह माफी मांगने के बजाय, उदयनिधि और उनके पिता एमके स्टालिन अपनी बातों पर अड़े रहे। उन्होंने इसे 'अभिव्यक्ति की आजादी' और 'द्रविड़ विचारधारा' का नाम देकर सही ठहराने की कोशिश की। ऐसा लगा जैसे सत्ता के नशे में उन्हें यह एहसास ही नहीं था कि वे करोड़ों लोगों की आस्था पर सीधे चोट कर रहे हैं।
कोर्ट की फटकार भी नहीं खोल पाई आंखें
इस मामले में जब उदयनिधि सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट पहुंचे, तो न्यायपालिका ने उन्हें जमकर आईना दिखाया था। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा था- आप कोई आम आदमी नहीं हैं, आप एक मंत्री हैं। आपको पता होना चाहिए कि आपके बयानों का समाज पर क्या असर होगा। हाईकोर्ट ने भी याद दिलाया था कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए। लेकिन, डीएमके नेतृत्व ने इस कानूनी और नैतिक चेतावनी को भी हल्के में लिया।
पिता-पुत्र की जोड़ी पर जनता की 'स्ट्राइक'
चुनाव में सबसे चौंकाने वाली बात सिर्फ हार नहीं है, बल्कि हार का तरीका है।
एमके स्टालिन (2277 वोटों से पीछे): एक सिटिंग मुख्यमंत्री का अपनी सीट से पीछे चलना यह बताता है कि राज्य में उनके खिलाफ कितनी भयंकर 'एंटी-इनकंबेंसी' (सत्ता विरोधी लहर) थी। जनता न सिर्फ उनके बेटे के बयानों से नाराज थी, बल्कि भ्रष्टाचार, परिवारवाद और प्रशासन की नाकामी से भी त्रस्त आ चुकी थी।
उदयनिधि स्टालिन का पिछड़ना: चेपॉक सीट डीएमके का गढ़ मानी जाती है। यहां से उदयनिधि का पिछड़ना यह साबित करता है कि जनता ने उनके 'सनातन' वाले बयान और उनके 'युवराज' वाले रवैये को सिरे से खारिज कर दिया है।
थलापति विजय बने 'जनता की आवाज'
डीएमके के इस पतन का सीधा फायदा सुपरस्टार थलापति विजय की पार्टी TVK को हुआ है। तमिलनाडु की जनता जो डीएमके के परिवारवाद और अहंकार से ऊब चुकी थी, और जिसे AIADMK में भी एक मजबूत विकल्प नहीं दिख रहा था, उसने विजय को एक नए, युवा और बेदाग विकल्प के रूप में अपना लिया है।




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