एशिया में स्थिरता के लिए ताकत के रूप में उभर रहा भारत, तुर्की ने की जमकर तारीफ
चेविकोज ने कहा कि पारंपरिक संस्थाएं अधिक विभाजित होते भू-राजनीतिक माहौल के साथ तालमेल बिठाने में संघर्ष कर रही हैं। उनके अनुसार क्षेत्र में सहयोग के नए रूप उभर रहे हैं, जैसे रणनीतिक साझेदारियाँ और मुद्दा-आधारित गठबंधन, उदाहरण के लिए क्वाड और ऑकस।

तुर्की के राजनयिक अहमेत उनाल चेविकोज ने कहा कि एशिया में भविष्य की स्थिरता काफी हद तक प्रभावी कूटनीति और इस बात पर निर्भर करेगी कि क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां अपनी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को संघर्ष में बदलने से कैसे रोकती हैं। चेविकोज ने राजधानी दिल्ली में आयोजित 10वें 'सिनर्जीया कॉन्क्लेव' में बोलते हुए कहा कि अभी एशिया वैश्विक आर्थिक विकास का केंद्र होने के साथ-साथ भू-राजनीतिक परिवर्तन का भी मुख्य क्षेत्र बन गया है। उन्होंने तारीफ करत हुए कहा कि एशिया में स्थिरता के लिए ताकत के रूप में भारत उभर रहा है।
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि मुझे एक बहुत ही साधारण अवलोकन से शुरुआत करनी चाहिए। आज एशिया वैश्विक विकास का इंजन भी है और भू-राजनीतिक बदलावों का केंद्र भी है। दुनिया के किसी और हिस्से में हमें आर्थिक गतिशीलता, तकनीकी नवाचार, बड़ी जनसंख्या और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का इतना बड़ा संगम नहीं दिखाई देता।" चेविकोज ने कहा कि यह स्थिति क्षेत्र के लिए अवसर भी पैदा करती है और जोखिम भी। उन्होंने जोर देकर कहा कि नीति-निर्माताओं के सामने मुख्य चुनौती कूटनीति के माध्यम से प्रतिस्पर्धा को संभालना है।
उन्होंने कहा, "राजनयिकों और नीति-निर्माताओं के लिए सवाल यह नहीं है कि एशिया में प्रतिस्पर्धा है या नहीं। प्रतिस्पर्धा अंतरराष्ट्रीय राजनीति की एक सामान्य विशेषता है। असली सवाल यह है कि क्या कूटनीति यह सुनिश्चित कर सकती है कि यह प्रतिस्पर्धा नियंत्रण में रहे और बढ़कर संघर्ष में न बदल जाए।" तुर्की के राजनयिक ने कहा कि एशिया में क्षेत्रीय स्थिरता ऐतिहासिक रूप से तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित रही है-अमेरिका की रणनीतिक उपस्थिति, चीन के वैश्विक बाजारों से जुड़ाव के कारण बनी आर्थिक परस्पर निर्भरता और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) के नेतृत्व में बहुपक्षीय कूटनीति।
साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण ये तीनों स्तंभ अब दबाव में हैं। उन्होंने कहा कि बड़ी शक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है और आर्थिक परस्पर निर्भरता अब तकनीकी प्रतिस्पर्धा, आपूर्ति श्रृंखला के विविधीकरण और आर्थिक सुरक्षा की चिंताओं से प्रभावित हो रही है। चेविकोज ने कहा कि पारंपरिक संस्थाएं अधिक विभाजित होते भू-राजनीतिक माहौल के साथ तालमेल बिठाने में संघर्ष कर रही हैं। उनके अनुसार क्षेत्र में सहयोग के नए रूप उभर रहे हैं, जैसे रणनीतिक साझेदारियाँ और मुद्दा-आधारित गठबंधन, उदाहरण के लिए क्वाड और ऑकस।
उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था धीरे-धीरे बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रही है, जहां कई शक्तियां एक साथ क्षेत्रीय घटनाक्रम को प्रभावित करती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था में कूटनीति और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि स्थिरता अब किसी एक प्रमुख शक्ति द्वारा सुनिश्चित नहीं होती। उन्होंने 2035 तक एशिया के भविष्य के तीन संभावित परिदृश्य भी बताए। पहला, "प्रतिस्पर्धात्मक स्थिरता", जिसमें अमेरिका और चीन जैसी बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा जारी रहेगी लेकिन वह नियंत्रित और पूर्वानुमानित सीमाओं में रहेगी।
दूसरा परिदृश्य "रणनीतिक विखंडन" का हो सकता है, जिसमें क्षेत्र में तकनीकी, आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े अलग-अलग प्रतिस्पर्धी समूह बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में खुला युद्ध भले न हो, लेकिन लगातार अस्थिरता और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ बनी रह सकती हैं। तीसरा और अधिक आशावादी परिदृश्य "सहयोगात्मक बहुध्रुवीयता" का हो सकता है, जिसमें क्षेत्रीय शक्तियां कठोर सैन्य गठबंधनों के बजाय लचीले सहयोग नेटवर्क विकसित करेंगी। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में एशिया प्रतिद्वंद्विता का युद्धक्षेत्र बनने के बजाय कूटनीतिक नवाचार की प्रयोगशाला बन सकता है।
उन्होंने मध्यम शक्तियों की बढ़ती भूमिका का भी उल्लेख किया और कहा कि भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण सेतु की भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने कहा, "आज के अंतरराष्ट्रीय माहौल में मध्यम शक्तियां केवल बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा की दर्शक नहीं रह गई हैं। कई मायनों में वे बहुध्रुवीय व्यवस्था को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।" चेविकोज़ ने एशिया के बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत की बढ़ती रणनीतिक महत्ता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की नीति उसे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में एक साथ कई साझेदारों के साथ जुड़ने की अनुमति देती है।
उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब कई देश किसी एक गठबंधन में बंधने के बजाय संतुलित संबंध चाहते हैं, भारत की कूटनीतिक शैली और भी प्रासंगिक हो रही है। उन्होंने प्राचीन भारतीय रणनीतिकार कौटिल्य और उनके ग्रंथ अर्थशास्त्र का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कौटिल्य ने "मंडल सिद्धांत" के माध्यम से बताया था कि राज्य अपने पड़ोसियों और संभावित प्रतिद्वंद्वियों के घेरे में होते हैं और स्थिरता स्थायी गठबंधनों से नहीं बल्कि संतुलित संबंधों के सावधानीपूर्वक प्रबंधन से उत्पन्न होती है। चेविकोज ने कहा कि एशिया का भविष्य केवल शक्ति संतुलन पर ही नहीं बल्कि कूटनीति की गुणवत्ता पर भी निर्भर करेगा। उन्होंने कहा, "राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा अपरिहार्य है, लेकिन उसका संघर्ष में बदलना अनिवार्य नहीं है। यदि कूटनीति सक्रिय, रचनात्मक और समावेशी बनी रहती है, तो एशिया वैश्विक अर्थव्यवस्था का सबसे गतिशील क्षेत्र बना रह सकता है।"




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