This is court not a police outpost Why SC Judge and lawyer clashes over Gobhi; what is connection with Bihar election SC में याचिका स्वीकार नहीं कर रहे थे जज, एडवोकेट निजाम ने की गोभी की चर्चा; फौरन क्यों मिल गई मंजूरी, India News in Hindi - Hindustan
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SC में याचिका स्वीकार नहीं कर रहे थे जज, एडवोकेट निजाम ने की गोभी की चर्चा; फौरन क्यों मिल गई मंजूरी

एडवोकेट पाशा की दलील पर बिदकते हुए जस्टिस मेहता ने कहा कि अगर राज्य सरकार ऐक्शन नहीं ले रही है तो आपको उस अधिकार क्षेत्र वाले हाई कोर्ट में जाना चाहिए। यह कोर्ट है, कोई पुलिस आउटपोस्ट नहीं है।

Tue, 25 Nov 2025 04:58 PMPramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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SC में याचिका स्वीकार नहीं कर रहे थे जज, एडवोकेट निजाम ने की गोभी की चर्चा; फौरन क्यों मिल गई मंजूरी

सुप्रीम कोर्ट में आज (मंगलवार, 25 नवंबर को) जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच में हेट स्पीच से जुड़े एक मामले की सुनवाई हो रही थी। सीनियर एडवोकेट निजाम पाशा ने हेट स्पीच से जुड़ी पहले की याचिका में एक हस्तक्षेप याचिका लगाई थी, जिस पर पीठ सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान निजाम पाशा ने कोर्ट को बताया कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हेट स्पीच के मामले बढ़ रहे हैं इसलिए मुख्य रिट याचिका में निर्देश के लिए यह आवेदन दिया है क्योंकि आर्थिक बहिष्कार के आह्वान शुरू हो गए हैं। फल और सब्जी मार्केट में अल्पसंख्यकों के बहिष्कार शुरू हो गए हैं। कुछ MP, MLA वगैरह ने भी ऐसा आह्वान किया है।

इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, "सभी धर्मों के खिलाफ हेट स्पीच हो रही है। वह सिर्फ एक धर्म के खिलाफ हेट स्पीच के लिए पब्लिक इंटरेस्ट पर पेश नहीं हो सकते। मैं सारी डिटेल्स दे सकता हूं।" तभी एडवोकेट पाशा ने कहा कि हुजूर, केंद्र सरकार कोई एक्शन नहीं ले रही है। इस बीच SG मेहता बोल पड़े, "मैं स्टेट नहीं हूँ, मैं यूनियन हूँ। लॉ एंड ऑर्डर मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है।"

यह हस्तक्षेप अर्जी क्यों लगाई गई?

इसी बहस के बीच जस्टिस संदीप मेहता ने हस्तेप किया और पूछा, "यह हस्तक्षेप अर्जी क्यों लगाई गई है? यह कोर्ट देश भर में ऐसी सभी घटनाओं पर नजर कैसे रख सकता है? अगर कोई घटना होती है तो उसके अधिकार क्षेत्र वाले हाई कोर्ट में जा सकते हैं।" इस पर पाशा ने कहा, “मीलॉर्ड! स्टेट एक्शन नहीं ले रहे हैं। इसलिए लॉर्डशिप कुछ गाइडलाइंस बनाई जा सकती हैं।”

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हर छोटी घटना को मॉनिटर नहीं कर सकते

इस पर बिदकते हुए जस्टिस मेहता ने कहा, "अगर राज्य सरकार ऐक्शन नहीं ले रही है तो आपको उस अधिकार क्षेत्र वाले हाई कोर्ट में जाना चाहिए। यह कोर्ट है, कोई पुलिस आउटपोस्ट नहीं है।" इसके बाद जस्टिस मेहता ने कहा, "हम इस पिटीशन की आड़ में कानून नहीं बनाने जा रहे हैं। यह तो पक्का है। हम इस देश के हर x y z छोटे इलाकों में होने वाली हर छोटी घटना को मॉनिटर नहीं कर सकते। पुलिस स्टेशन हैं, हाई कोर्ट हैं। वहां जाइए।"

इसका मतलब कम्युनल हिंसा है

तभी पाशा ने कहा, “एक ऑर्डर पास किया गया है जिसमें कहा गया है कि जहां भी ऐसी घटनाएं होती हैं, पुलिस खुद से एक्शन ले सकती है।” इस पर जस्टिस मेहता ने कहा कि अगर वे ऐसा नहीं कर रहे हैं तो यह कंटेम्प्ट है। आप हाई कोर्ट जाइए। तभी पाशा ने मामले का उल्लेख करते हुए कहा, "यह असम के एक मौजूदा मंत्री हैं, जिन्होंने बिहार चुनाव पर कमेंट करते हुए कहा है कि बिहार में गोभी की खेती हुई है। इसका मतलब कम्युनल हिंसा है... माइनॉरिटी कम्युनिटी के लोगों को फूलगोभी के खेतों में दफनाया गया था।

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जस्टिस नाथ को देना पड़ा दखल

बार एंड बेंच के मुताबिक, एडवोकेट पाशा की इस दलील पर सीनियर जज जस्टिस नाथ ने कहा कि हम इसे मेन पिटीशन के साथ टैग करेंगे। इसके बाद उन्होंने आदेश दिया कि 9 दिसंबर को अगली सुनवाई में रिट पिटीशन के साथ इसे टैग कर सभी मामलों को एक साथ लिस्ट किया जा सकता है।

बिहार चुनाव से क्या कनेक्शन?

दरअसल, एडवोकेट पाशा की चिंता बिहार चुनाव में एनडीए को मिली बंपर जीत के बाद असम के मंत्री और भाजपा नेता अशोक सिंघल द्वारा सोशल मीडिया पर किए गए एक पोस्ट से जुड़ी है, जिसमें उन्होंने गोभी लगे खेतों की एक तस्वीर साझा करते हुए लिखा था कि बिहार ने गोभी की खेती को मंजूरी दे दी है। बता दें कि राजनीतिक हलके में इसे एक सांप्रदायिक पोस्ट के रूप में लिया गया, जिसका इशारा 1989 के भागलपुर दंगे की तरफ किया गया है। भागलपुर दंगे के दौरान कथित तौर पर बड़ी संख्‍या में अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के लोगों को मार कर दफना दिया गया था। आरोप लगते हैं कि जांच से बचने के लिए शवों को खेतों में दबा दिया गया था और उन्हीं खेतों में फूलगोभी की फसल लगा दी गई थी।