तलाक मांगने सुप्रीम कोर्ट पहुंचा पति, जज बोले- शांति से बैठे रहो, 15 हजार देते रहो और खुश रहो
पति ने खुद के पास पैसे नहीं होने की बात कही। वकील ने कहा कि मेरे पास पैसे नहीं हैं। मेरी सैलरी ही 65 हजार है, कोई पेंशन भी नहीं है और उम्र भी 54 साल हो गई है। इस पर कोर्ट ने तुरंत जवाब दिया कि तब तुम 15 हजार रुपये देते रहो। कोर्ट ने कहा कि शांति से बैठे रहो, 15 हजार देते रहो, खुश रहो।

पति-पत्नी का रिश्ता यूं तो सात जन्मों का होता है, लेकिन कई बार सबकुछ ठीक न होने की वजह से तलाक तक बात आ जाती है। शुरुआत में दोनों और उनका परिवार रिश्ते को ठीक करने की कोशिश करते हैं, लेकिन जब सफलता नहीं मिलती तो वे तलाक के लिए कोर्ट का रुख करते हैं। सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को तलाक का एक ऐसा ही मामला आया, जिसमें जज ने हर महीने मेंटेनेंस दे रहे शख्स से दो टूक कहा कि शांति से बैठे रहो, हर महीने 15 हजार रुपये दो और खुश रहो।
बार एंड बेंच के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में तलाक के एक मामले को लेकर सुनवाई हुई। इसमें पति के वकील ने कहा कि हम दोनों 16 सालों से अलग रह रहे हैं। मैं 15 हजार रुपये गुजारा भत्ता दे रहा हूं, कृपया मुझे तलाक की अनुमति दे दें। इस पर पत्नी के वकील ने कहा कि मैं अपने पति के साथ रहने के लिए तैयार हूं।
कोर्ट ने पति से कहा कि अपनी पत्नी को अपने साथ रखो, जिसपर उसके वकील ने फिर कहा कि हम लोग को 16 साल हो गए अलग रहते हुए। उसके स्वभाव में तालमेल की दिक्कत है। फिर कोर्ट ने पूछा कि आप एकमुश्त गुजारा भत्ता के तौर पर कितनी रकम दे सकते हैं। आजकल 15 हजार की कोई खास कीमत नहीं है।
इस पर पति ने खुद के पास पैसे नहीं होने की बात कही। वकील ने कहा, ''मेरे पास पैसे नहीं हैं। मेरी सैलरी ही 65 हजार है, कोई पेंशन भी नहीं है और उम्र भी 54 साल हो गई है।'' इस पर कोर्ट ने तुरंत जवाब दिया कि तब तुम 15 हजार रुपये देते रहो। पति ने फिर तलाक देने की मांग की। इस पर कोर्ट ने कहा, ''शांति से बैठे रहो, 15 हजार देते रहो, खुश रहो।''
'आपने जज को खुले बाजार में बेचने की कोशिश की'
वहीं, एक अन्य मामले में पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने उस वकील की जमानत याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसे तलाक के एक मामले में अनुकूल न्यायिक आदेश दिलाने के लिए 30 लाख रुपये की रिश्वत मांगने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। न्यायालय ने कहा कि वह ''न्यायपालिका को बेच रहा था''। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, ''आपने (याचिकाकर्ता ने) एक न्यायाधीश को खुले बाजार में बेचने की कोशिश की।'' जब पीठ ने याचिका पर विचार करने को लेकर अपनी अनिच्छा दिखाई, तो याचिकाकर्ता के वकील ने इसे वापस ले लिया।




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