Supreme Court judge Justice Ujjal Bhuyan highlights gap between Constitutional values and reality मेरी बेटी की मुस्लिम दोस्त को… SC जज का बड़ा बयान, बोले- समाज में आज भी गहरी दरार, India News in Hindi - Hindustan
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मेरी बेटी की मुस्लिम दोस्त को… SC जज का बड़ा बयान, बोले- समाज में आज भी गहरी दरार

संवैधानिक नैतिकता का मतलब समझाते हुए, जस्टिस भुइयां ने कहा कि सभी पब्लिक इंस्टीट्यूशन और नागरिकों से इसका पालन करने की उम्मीद की जाती है। उन्होंने कुछ उदाहरण भी दिए।

Tue, 24 Feb 2026 04:26 PMJagriti Kumari लाइव हिन्दुस्तान
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मेरी बेटी की मुस्लिम दोस्त को… SC जज का बड़ा बयान, बोले- समाज में आज भी गहरी दरार

सुप्रीम कोर्ट के जज ने हाल ही में बड़ा बयान दिया है। जस्टिस उज्जल भुइयां ने हाल ही में एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि किस तरह उनकी एक बेटी की दोस्त को मुस्लिम होने की वजह से घर देने से मना कर दिया गया था। इस दौरान जस्टिस भुइयां ने कहा कि सामाजिक रीति-रिवाज अक्सर संवैधानिक मूल्यों से अलग होते हैं।

जस्टिस भुइयां हैदराबाद में तेलंगाना जजेज एसोसिएशन और तेलंगाना स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी द्वारा आयोजित एक सेमिनार को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान 'संवैधानिक नैतिकता और जिला न्यायपालिका की भूमिका' के विषय पर बोलते हुए SC जज ने इस घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी की दोस्त दिल्ली में घर ढूंढ रही थी। लेकिन कैसे मकान मालकिन ने स्टूडेंट की धार्मिक पहचान का पता चलने के बाद उसे घर देने से मना कर दिया था।

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जस्टिस भुइयां ने कहा, “वह एक मकान मालकिन के पास गई जो साउथ दिल्ली में अपनी बिल्डिंग में वर्किंग विमेन हॉस्टल चला रही थी। मकान मालकिन ने उससे पूछा कि उसका नाम क्या है। जब उसने अपना नाम बताया, जो थोड़ा अलग था, तब मकान मालकिन उससे उसका सरनेम पूछने लगी। मुस्लिम नाम का पता चलते ही मकान मालकिन ने उससे कहा कि रहने की जगह उपलब्ध नहीं है और वह कोई दूसरी जगह ढूंढ ले।”

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ओडिशा में दलित रसोइए के बहिष्कार का भी जिक्र

अपने वक्तव्य में जस्टिस भुइयां ने ओडिशा में मिड-डे मील स्कीम से जुड़ी हाल की एक घटना का भी जिक्र किया। जस्टिस भुइयां ने कहा कि कुछ माता-पिता ने अपने बच्चों को दलित रसोइए के हाथ का खाना खाने से रोक दिया। जस्टिस भुइयां ने कहा कि ऐसी घटनाएं समाज में बड़े बंटवारे को दिखाती हैं जो संवैधानिक अधिकारों के बावजूद बने हुए हैं।

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उन्होंने कहा, “ऊपर दिए गए दो उदाहरण तो सिर्फ उदाहरण हैं। ये बस उस पहाड़ की चोटी जो दिखाती है कि समाज में कितनी गहरी दरारें हैं। असल में, यह हमारे लिए एक आईना है जो दिखाता है कि हमारे गणतंत्र के पचहत्तर साल बाद भी हम संवैधानिक नैतिकता के बेंचमार्क से कितने दूर हैं।”

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