संविधान के चित्रकार के पोते और उनकी पत्नी का नाम वोटर लिस्ट से गायब, बंगाल में कैसे हो रहा SIR
कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस शाहिदुल्लाह मुंशी और उनके परिवार के नाम भी शुरू में हटा दिए गए थे। जस्टिस मुंशी ने बार एंड बेंच को बताया कि उन्हें नाम हटाने का कोई कारण नहीं बताया गया, जिससे अपील करना मुश्किल हो गया।

नंदलाल बोस के पौत्र सुप्रबुद्ध सेन और उनकी पत्नी का नाम पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से गायब हो गया है। भारतीय संविधान के चित्रकार नंदलाल बोस के पोते ने बताया कि SIR के दौरान उनका और पत्नी का नाम शुरू में पेंडिंग बताया गया, लेकिन बाद में उन्हें हटा दिया गया। यह घटना राज्य विधानसभा चुनाव से पहले चल रहे मतदाता सूची संशोधन अभियान के बीच आई है। बताते हैं कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कहने पर नंदलाल बोस ने संविधान की मूल प्रति को भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने के लिए चित्र बनाए।
नंदलाल बोस का आधुनिक भारतीय कला में अहम योगदान रहा है। उन्होंने भारतीय संविधान की मूल प्रति में मोहनजोदड़ो की मुहरों से लेकर वैदिक आश्रम, रामायण-महाभारत, बुद्ध और महावीर के जीवन, अशोक की ओर से बौद्ध धर्म का प्रसार, गुप्त कला व मुगल वास्तुकला तक का सुंदर चित्रण किया। इसमें अकबर, शिवाजी, गुरु गोबिंद सिंह, टीपू सुल्तान, रानी लक्ष्मीबाई, महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के चित्र भी शामिल हैं। बिहार में जन्मे नंदलाल बोस का निधन पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में हुआ था।
SIR की प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल
चुनाव आयोग के SIR अभियान में मतदाता सूची की जांच, ड्राफ्ट रोल का प्रकाशन और दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया शामिल है। हालांकि, इसकी पारदर्शिता और सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस शाहिदुल्लाह मुंशी और उनके परिवार के नाम भी शुरू में हटा दिए गए थे। जस्टिस मुंशी ने बार एंड बेंच को बताया कि उन्हें नाम हटाने का कोई कारण नहीं बताया गया, जिससे अपील करना मुश्किल हो गया। उन्होंने दस्तावेज जमा करने पर रसीद न मिलने की भी शिकायत की। बाद में उनकी आपत्ति पर नाम जोड़ दिए गए।
ममता बनर्जी ने फरवरी में सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर कर SIR प्रक्रिया को चुनौती दी थी। उन्होंने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम कटने की आशंका जताई और मौजूदा मतदाता सूची पर चुनाव कराने की मांग की। एससी ने 20 फरवरी को न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति का आदेश दिया। 23 फरवरी से 2 अप्रैल तक 900 न्यायिक अधिकारियों ने मात्र 27 कार्य दिवसों में 52 लाख आपत्तियों का निपटारा किया, जो प्रतिदिन औसतन 1.92 लाख मामलों की दर है। इस तेज गति पर भी पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।




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