क्या है महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन विधेयक का विवाद?
हाल ही में लोकसभा में परिसीमन से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक गिर गया। सरकार ने विपक्ष पर महिलाओं का अपमान करने का आरोप लगाया है, जबकि विपक्ष इसे सरकार की नीयत पर सवाल उठाने का अवसर मानता है। महिला...

लोकसभा में पिछले दिनों परिसीमन से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक पर्याप्त संख्या बल के अभाव में गिर गया.सरकार विपक्ष पर महिलाओं के अपमान का आरोप लगा रही है लेकिन विपक्ष इसे सरकार के षड्यंत्र के तौर पर पेश कर रहा है.पिछले हफ्ते तीन दिन के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया गया, जिसमें 131वें संविधान विधेयक पर चर्चा के बाद उसे पारित कराने की कोशिश थी.हालांकि यह विशेष सत्र नहीं बल्कि बजट सत्र का ही विस्तारित हिस्सा था.लेकिन इस सत्र की टाइमिंग और उसमें लाए जाने वाले विधेयक को लेकर सरकार विपक्ष के निशाने पर रही और आखिरकार वही हुआ, जिसकी आशंका जताई जा रही थी.करीब तीन साल पहले पारित महिला आरक्षण कानून में संशोधन के लिए लाए जाने वाले 131वें संविधान संशोधन विधेयक का मुख्य मकसद परिसीमन करना था जिसके लिए विपक्ष तैयार नहीं था.विधेयक पारित नहीं हो सका और अगले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में कांग्रेस पार्टी समेत समूचे विपक्ष पर आरोप लगाया कि इन पार्टियों ने महिलाओं का अपमान किया है.वहीं विपक्ष का कहना है कि महिलाओं के अपमान का तो सवाल ही नहीं है, क्योंकि विधेयक में महिला आरक्षण से संबंधित कोई बात ही नहीं है.बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने विधेयक का बचाव करते हुए मीडिया से बातचीत में कहा कि डीलिमिटेशन के बिना आरक्षण को लागू करना संभव ही नहीं है.उनका कहना था, "संवैधानिक मर्यादाओं को समझे बिना ऐसी बातें करना आसान है.बिना डीलिमिटेशन किए और कांस्टीट्यूएंसी बढ़ाए, आरक्षण लागू करना संभव ही नहीं है.यदि ऐसा करेंगे तो पुरुषों के अधिकार का सवाल उठेगा.इसलिए सरकार का प्रस्ताव संविधान के दायरे में है"ऐसे में अभी भी कई लोगों में ये दुविधा है कि आखिर माजरा क्या है? सरकार विपक्ष पर महिलाओं के अपमान का आरोप क्यों लगा रही है और विपक्ष सरकार की नीयत पर सवाल क्यों उठा रहा है?नया विधेयक बनाम पुराना विधेयकदरअसल, महिला आरक्षण विधेयक जिसे "नारी शक्ति वंदन अधिनियम" कहा गया है, उसे 2023 में ही संसद के दोनों सदनों में पारित किया जा चुका है और वो कानून भी बन चुका है.106वें संविधान संशोधन के रूप में उस विधेयक को पारित कराने के लिए भी तत्कालीन सरकार के पास पर्याप्त बहुमत नहीं था लेकिन विपक्ष के समर्थन से उस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित किया गया था.पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल राज्यसभा सदस्य हैं और सुप्रीम कोर्ट में वकील भी हैं.डीडब्ल्यू से बातचीत में वरिष्ठ कांग्रेस नेता कहते हैं, "विधेयक पास कराने की सरकार की मंशा ही नहीं थी.वो तो यही चाहते थे कि कैसे इसके बहाने चुनाव के दौरान भाषण देने का मौका मिले.महिला आरक्षण विधेयक तो 2023 में ही पास हो चुका है, और सर्वसम्मति से पास हो चुका है.हम सबने उसे मिलकर पास कराया है.उस विधेयक में आपने देश से वादा किया था कि 2026 के बाद जनगणना होगी, उसके बाद परिसीमन होगा और फिर महिला आरक्षण की व्यवस्था तय की जाएगा.ये उनका संवैधानिक कर्तव्य था लेकिन सरकार उससे पीछे हट गई"दरअसल, 2023 में पारित संविधान संशोधन विधेयक में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण का प्रावधान किया गया है लेकिन उस वक्त सरकार का कहना था कि इसकी व्यवस्था जनगणना और परिसीमन के बाद तय की जाएगी.औरतों को अब तक जो आरक्षण मिला उससे क्या सीखा भारत नेसरकार की मंशा पर सवाललेकिन जब अचानक सरकार 131वां संशोधन विधेयक 2026 लेकर आई तो विपक्ष सरकार की मंशा पर सवाल उठाने लगा.उसका कारण यह था कि सरकार अपने ही वादे से मुकर रही थी.यानी 2026 की जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन के बजाय, सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन कर रही थी.हालांकि विपक्ष को सबसे ज्यादा आपत्ति विधेयक के दूसरे हिस्से पर थी जिसके तहत लोकसभा में सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था.लोकसभा सदस्य और कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी का साफतौर पर कहना था कि महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण अभी देना है तो 543 सीटों पर ही सरकार क्यों नहीं दे रही है.इस दौरान एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुआ जिसमें सरकार उलझ गई.दरअसल, 2023 का विधेयक संसद में पारित भी हो गया था और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद वो कानून भी बन गया था लेकिन कानून नोटिफाई नहीं हुआ था और बिना नोटिफाई हुए वह व्यावहारिक रूप में अमल में नहीं था.कानूनी जानकारों के मुताबिक, बिना अमल में आए किसी कानून में संशोधन नहीं हो सकता.इसलिए सरकार ने जिस दिन नया संविधान संशोधन विधेयक पेश किया उसी रात अचानक पुराने कानून का नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया.सरकार की इस हड़बड़ी और अचानक नए विधेयक लाने को लेकर इन्हीं वजहों से सवाल उठ रहे हैं.वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका वृंदा गोपीनाथ कहती हैं कि वास्तव में यह महिला आरक्षण विधेयक था ही नहीं, बल्कि परिसीमन के जरिए आरक्षण लागू करने की कोशिश थी जिसमें सरकार नाकाम रही.उनके मुताबिक, "सबसे पहले यह स्पष्ट कर लेना जरूरी है कि संसद में जिस विधेयक को खारिज किया गया, वह महिला आरक्षण विधेयक 2026 नहीं था, बल्कि 131वां संविधान संशोधन विधेयक, 2026 था जिसका मकसद परिसीमन के जरिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण लागू करना था.लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 850 करने से दक्षिणी और पूर्वी राज्यों के हित प्रभावित होते.सरकार को भी यह मालूम था"महिला आरक्षण के बीच कैसे आया परिसीमन?दरअसल, विपक्षी दलों का विरोध इस बात को लेकर था कि सरकार ने महिला आरक्षण को चुपचाप परिसीमन से जोड़ दिया, जबकि सरकार को मालूम था कि परिसीमन के आधार पर लोकसभा में सीटें बढ़ाए जाने का दक्षिण भारत के राज्य विरोध कर रहे हैं.यही नहीं, लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में सीटें बढ़ाने को लेकर और भी कई व्यवस्थागत सवाल उठाए जा रहे हैं.राज्यसभा सांसद पी विल्सन तो एक प्राइवेट मेंबर बिल के लिए भी राज्यसभा में नोटिस दिया ताकि लोकसभा की मौजूदा सीटों पर ही आरक्षण सुनिश्चित किया जाए लेकिन उनके नोटिस को खारिज कर दिया गया.उन्होंने राज्यसभा में नियम 267 के तहत यह नोटिस दिया था.उधर, विधेयक के लोकसभा से खारिज हो जाने के बाद सत्तापक्ष की ओर से दावा किया जा रहा है कि इसके जरिए महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही थी जिसे विपक्ष ने नाकाम कर दिया.लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि देश की आम महिलाएं इस कानून को कैसे देख रही हैं.ज्यादातर महिलाओं का ये मानना है कि राजनीति में आने की इच्छुक महिलाओं के लिए तो ये एक अवसर की तरह जरूर है लेकिन आम महिलाओं के भीतर इसे लेकर कोई बहुत उत्साह नहीं है.कितनी सशक्त होंगी महिलाएं?दिल्ली से सटे नोएडा में एक निजी स्कूल में पढ़ाने वाली सुष्मिता राय कहती हैं, "निश्चित तौर पर इस कानून से महिलाएं सशक्त होतीं क्योंकि अब ऐसा लग रहा है कि राजनीति में हमारी भूमिका सिर्फ वोट देने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि नीति बनाने तक पहुंचेगी.लेकिन उससे भी बड़ा सवाल ये है कि ये मौका किसे मिलेगा? इसका फायदा तो राजनीतिक परिवारों की महिलाएं ही ज्यादा उठाएंगी.फिर भी, कुछ नहीं से बेहतर तो रहेगा ही"हालांकि कुछ महिलाओं से बातचीत करने पर ये पता चलता है कि आम महिलाओं के भीतर राजनीति को लेकर इस कानून ने एक नई सोच जरूर पैदा की है, खासकर युवा वर्ग की महिलाओं में.भारत के चुनाव में बढ़ती भागीदारी के बावजूद महिलाओं को टिकट कमदीप्ति श्रीवास्तव दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए कर रही हैं.डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहती हैं, "जिस तरह के बदलाव समाज में आ रहे हैं, उससे यह तो स्पष्ट है कि राजनीति अब केवल पुरुषों के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह गई है.महिलाएं भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं.गैर-राजनीतिक परिवारों की महिलाएं भी तेजी से राजनीति में आ रही हैं.33 फीसदी आरक्षण की वजह से महिलाओं का आकर्षण और बढ़ेगा.मौका मिला तो मेरे जैसे लोग भी चुनाव लड़ने के बारे में सोच सकते हैं"दीप्ति श्रीवास्तव आगे कहती हैं, "राजनीति में महिलाओं की संख्या बढ़ने से जैसे महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, कार्यस्थल पर समानता जैसे मुद्दों पर ज्यादा चर्चा हो सकती है जो कि आमतौर पर हाशिये पर चले जाते हैं.संसद और विधायिका में जेंडर बैलेंस भी रहेगा.लेकिन इन सबके लिए जरूरी यह है कि जो महिलाएं चुनकर आएं, वे खुद फैसले लेने की स्थिति में हों, न कि किसी और के प्रभाव में काम करें".




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