TMC में बगावत, कांग्रेस-DMK की दूरी; BJP के लिए संसद में आसान होगी दो तिहाई बहुमत की राह
NDA: टीएमसी के एक सांसद ने नाम न छापने की शर्त पर टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि यह पूरा विद्रोह मुख्य रूप से ममता बनर्जी के उत्तराधिकारी और भतीजे अभिषेक बनर्जी के पार्टी में बढ़ते दबदबे के खिलाफ है।

TMC Crisis: अभी कुछ ही समय पहले तक ऐसा लग रहा था कि एक एकजुट विपक्ष केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी विधायी एजेंडे और उसके राजनीतिक नैरेटिव को पटरी से उतार सकता है। पिछले सत्र में लोकसभा के भीतर महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े सरकारी विधेयक की हार ने विपक्ष के इस हौसले को और मजबूत किया था। लेकिन अब संसद के भीतर और बाहर भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के लिए आगे की राह बेहद आसान नजर आ रही है। इसकी मुख्य वजह यह है कि भाजपा के दो सबसे मजबूत क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी तृणमूल कांग्रेस (TMC) और द्रमुक (DMK) इस समय बड़े राजनीतिक संकटों और चुनौतियों से जूझ रहे हैं।
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी इस समय अपने राजनीतिक इतिहास के सबसे बड़े अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है। पार्टी के कुल 80 विधायकों में से 58 बागी विधायकों के एक गुट ने ममता बनर्जी की पसंद के विपरीत ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन लिया है। साल 1998 में ममता बनर्जी द्वारा पार्टी की स्थापना किए जाने के बाद से यह टीएमसी में अब तक का पहला औपचारिक विभाजन है।
भतीजे अभिषेक के खिलाफ गुस्सा
टीएमसी के एक सांसद ने नाम न छापने की शर्त पर टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि यह पूरा विद्रोह मुख्य रूप से ममता बनर्जी के उत्तराधिकारी और भतीजे अभिषेक बनर्जी के पार्टी में बढ़ते दबदबे के खिलाफ है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि विधायकों की इस बगावत का असर लोकसभा में टीएमसी के 28 और राज्यसभा में 13 सांसदों पर भी पड़ना तय है। हालांकि, दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए आवश्यक दो-तिहाई सांसदों का बागी गुट बनना अभी बाकी है, लेकिन भविष्य में इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।
डीएमके और कांग्रेस में दूरी
दक्षिण भारत में भी विपक्ष का गणित पूरी तरह बिगड़ चुका है। तमिलनाडु में कांग्रेस ने अपने पुराने और भरोसेमंद साथी द्रमुक (DMK) का हाथ छोड़कर सुपरस्टार से नेता बने विजय की नई पार्टी टीवीडी (TVK) से हाथ मिला लिया है। इस धोखे के बाद DMK अब केंद्र सरकार के प्रति अपनी पारंपरिक और स्वाभाविक शत्रुता को छोड़कर एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने पर विचार कर रही है। भाजपा खेमे का मानना है कि राज्य के नए समीकरणों के कारण अब DMK केंद्र के साथ टकराव के बजाय सहयोग का रास्ता चुन सकती है।
सरकार के लिए क्यों गेमचेंजर साबित होगी यह स्थिति?
हाल ही में हुए लोकसभा के घटनाक्रम को देखें तो यह कांग्रेस के साथ तीन बड़े क्षेत्रीय दलों समाजवादी पार्टी (SP), टीएमसी (TMC) और द्रमुक (DMK) का एक साथ आना ही था, जिसने लोकसभा में सरकार के संविधान संशोधन विधेयक को गिरा दिया था। इन दलों के पास कुल 185 सांसद थे, जो सदन की कुल संख्या का एक-तिहाई से अधिक थे।
टीएमसी के बिखराव और कांग्रेस से नाराज चल रही DMK के कारण भाजपा 2024 के चुनावों के बाद पहली बार विपक्ष की आपसी फूट का फायदा उठाने की सबसे मजबूत स्थिति में है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि महाराष्ट्र के कुछ विपक्षी सांसद भी पाला बदलने या अपनी निष्ठा बदलने पर विचार कर रहे हैं। विपक्ष के कमजोर और बिखरे होने के बाद अब मोदी सरकार अपने सबसे महत्वाकांक्षी एजेंडे जिसमें 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' शामिल है, को नए उत्साह और ताकत के साथ संसद में आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है।




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