शराब खुलेआम बिकती है, सेनेटरी पैड अखबार में लपेटकर देते हो; क्या बोले राघव चड्ढा
राघव चड्ढा ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता कोई दान या एहसान नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और समानता का मूलभूत मुद्दा है। उन्होंने संसद में इस विषय को उठाया क्योंकि यह भारत की 35 करोड़ से अधिक महिलाओं और लड़कियों को प्रभावित करता है।

राज्यसभा सांसद और आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा ने संसद में मासिक धर्म स्वच्छता के मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक ट्वीट के माध्यम से अपनी बात रखी, जिसमें कहा कि अगर कोई लड़की स्कूल नहीं जा पाती क्योंकि वहां सेनेटरी पैड, पानी या निजता की कमी है, तो यह उसकी व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक विफलता है। चड्ढा ने इस बात पर प्रकाश डाला कि भारत में शराब और सिगरेट खुलेआम बिकते हैं, लेकिन सेनेटरी पैड को अखबार में लपेटकर छिपाया जाता है, जैसे कि यह कोई छिपाने वाली चीज हो। उन्होंने इसे एक सत्य को सामाजिक वर्जना में बदलने का उदाहरण बताया।
राघव चड्ढा ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छता कोई दान या एहसान नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और समानता का मूलभूत मुद्दा है। यह सबसे ऊपर गरिमा का सवाल है। उन्होंने संसद में इस विषय को उठाया क्योंकि यह भारत की 35 करोड़ से अधिक महिलाओं और लड़कियों को प्रभावित करता है। समाज में मासिक धर्म को लेकर डर, शर्म और चुप्पी अभी भी बनी हुई है, जो लाखों लड़कियों की शिक्षा और जीवन को प्रभावित करती है। चड्ढा ने जोर दिया कि एक राष्ट्र तब तक सच्चा प्रगतिशील नहीं कहला सकता जब तक लाखों लड़कियां इस बुनियादी बात के लिए डर और शर्मिंदगी महसूस करती रहेंगी।
आखिर कितना गंभीर है यह मुद्दा
आप सांसद ने इस मुद्दे को शिक्षा और स्वास्थ्य से जोड़ते हुए बताया कि स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण कई लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं। सेनेटरी पैड की उपलब्धता, स्वच्छ शौचालय और पानी जैसी सरल चीजें न होने से उनकी शिक्षा बाधित होती है। राघव चड्ढा ने समाज से अपील की कि मासिक धर्म को विज्ञान का विषय मानकर खुलकर बात की जाए, न कि चुप्पी साधी जाए। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ महिलाओं का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
राघव चड्ढा ने कहा कि समाज की सच्ची प्रगति का परीक्षण इसी बात से होगा कि जिस दिन भारत की हर लड़की स्कूल जा सके, गरिमा के साथ जी सके और इस विषय पर बिना किसी कलंक के बात कर सके, उसी दिन हम कह सकेंगे कि हमारा समाज आगे बढ़ चुका है। इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने सभी संस्थानों में महिलाओं के लिए सवैतनिक मासिक धर्म अवकाश की मांग करने संबंधी रिट याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जज जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि वह सभी हितधारकों के साथ परामर्श करके मासिक धर्म अवकाश नीति बनाने के लिए याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन पर विचार करे। अदालत ने चिंता व्यक्त की कि कानून के माध्यम से मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य करने से महिलाओं के रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।




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