Poore desh ke poojari tum hi ho kya CJI Sutyakant slams Young Lawyers Association for Sabarimala PIL पूरे देश के पुजारी तुम ही हो क्या? इससे मिल क्या जाएगा; भरी अदालत किस पर भड़क उठे CJI सूर्यकांत, India News in Hindi - Hindustan
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पूरे देश के पुजारी तुम ही हो क्या? इससे मिल क्या जाएगा; भरी अदालत किस पर भड़क उठे CJI सूर्यकांत

CJI Suryakant: CJI सूर्यकांत ने कहा कि आपने यह पीआईएल क्यों दायर की है? क्या आप ही देश के मुख्य पुजारी हैं? इससे आपको क्या हासिल हो जाएगा?'' इस पर वकील ने जवाब दिया कि उनकी संस्था एक पंजीकृत संस्था है।

Tue, 5 May 2026 10:30 PMPramod Praveen पीटीआई, नई दिल्ली
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पूरे देश के पुजारी तुम ही हो क्या? इससे मिल क्या जाएगा; भरी अदालत किस पर भड़क उठे CJI सूर्यकांत

CJI Suryakant: सुप्रीम कोर्ट ने आज (मंगलवार, 5 मई को) उस गैर-सरकारी संगठन (NGO) को कड़ी फटकार लगाई, जिसकी जनहित याचिका (PIL) पर शीर्ष अदालत ने सबरीमाला मंदिर में सभी आयु की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। शीर्ष अदालत ने एनजीओ 'इंडियन यंग लॉयर्स' की धार्मिक मान्यता और उसकी मंशा पर भी सवाल उठाए। मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने यह जानना चाहा कि 2006 में यह याचिका दायर करने के पीछे एनजीओ का उद्देश्य क्या है और मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे में उसका क्या हित या भूमिका है।

पीठ में जस्टिस सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बी वी नागरत्ना, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। मंगलवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने एनजीओ की ओर से पेश अधिवक्ता रवि प्रकाश गुप्ता से कहा, ''यह काफी गंभीर मामला है। जिन लोगों को देवता में आस्था है, वे सभी आवश्यक नियमों का पालन करेंगे। लेकिन कोई यह कहे कि वह सभी 'नियम' तोड़ देगा, (तो) इसे अदालत प्रोत्साहित नहीं कर सकती। आप कह रहे हैं कि जिन लोगों को उस देवता में आस्था या विश्वास नहीं है, उन्हें भी प्रवेश दिया जाए। आप सच्चे श्रद्धालु नहीं हैं।''

एनजीओ पूजा के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है

यह टिप्पणी उस समय आई जब पीठ केरल के सबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ कथित भेदभाव और अलग-अलग धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी। शीर्ष अदालत ने गुप्ता से यह भी सवाल किया कि एक विधिक इकाई होने के नाते यह एनजीओ पूजा करने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है और क्या आस्था रखने वाले लोग इस संस्था में शामिल हैं।

आपके पास कोई अंतरात्मा नहीं है

'इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन' की ओर से पेश वकील ने बताया कि जून 2006 में अखबार में चार लेख प्रकाशित हुए थे और जनहित याचिका उन्हीं पर आधारित है। उन्होंने कहा कि यह याचिका उन खबरों के आधार पर दायर की गई थी, जिनमें ज्योतिषियों ने दावा किया था कि एक महिला के मंदिर में प्रवेश करने के बाद मंदिर अपवित्र हो गया था। जैसे ही वकील ने अपनी दलीलें प्रस्तुत करनी शुरू कीं, जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की, ''आप जैसी एक विधिक (कानूनी) संस्था की कोई आस्था कैसे हो सकती है? यह तो किसी व्यक्ति के लिए होती है। आपके पास कोई अंतरात्मा नहीं है।''

आपने यह पीआईएल क्यों दायर की

इसके बाद CJI सूर्यकांत ने कहा, '' आपने यह पीआईएल क्यों दायर की है? क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं? इससे आपको क्या हासिल हो जाएगा?'' इस पर वकील ने जवाब दिया कि उनकी संस्था एक पंजीकृत संस्था है। इसी दौरान जस्टिस कुमार ने भी पूछा, ''क्या आपकी संस्था ने पीआईएल दायर करने के लिए कोई प्रस्ताव पारित किया है? क्या इस पर आपके अध्यक्ष ने हस्ताक्षर किए हैं?'' इस पर गुप्ता ने जवाब दिया कि उस समय संगठन के अध्यक्ष नौशाद अली नामक व्यक्ति थे और उन्हें किसी ऐसे प्रस्ताव की जानकारी नहीं थी।

नौशाद ने चालाकी दिखाई है

इस पर जस्टिस सुंदरश ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा, ''नौशाद ने चालाकी दिखाई है... यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग मात्र है।'' गुप्ता ने उत्तर दिया कि इस मामले में एनजीओ ही मूल याचिकाकर्ता था और नौशाद सिर्फ नाममात्र के अध्यक्ष थे, जिन्हें इस मुकदमे की जानकारी नहीं थी। पहले दी गई दलीलों का हवाला देते हुए अधिवक्ता ने कहा कि मंदिर के तंत्री (पुजारी) ने उल्लेख किया है कि युवा महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि देवता युवा महिलाओं को पसंद नहीं करते।

यहां आपका क्या काम है?

जस्टिस नागरत्ना ने तब टिप्पणी की, ''आप इस मामले से कैसे जुड़े हैं? यहां आपका क्या काम है? याचिकाकर्ता ने अन्य मुद्दों के बजाय इसी मामले को आगे बढ़ाने का फैसला क्यों किया? क्या यंग लॉयर्स एसोसिएशन के पास और कोई काम नहीं है? क्या वे बार के कल्याण के लिए काम नहीं कर सकते या इस देश की न्यायिक व्यवस्था में पीठ की सहायता नहीं कर सकते?'' उन्होंने कहा, ''बार के लिए काम कीजिए, युवा सदस्यों और उनके कल्याण के लिए काम कीजिए। जो लोग ग्रामीण क्षेत्रों में संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें शहरों में आकर मामलों की पैरवी करने में कठिनाई होती है। उनके पास भी तेज दिमाग है। अलग-अलग पृष्ठभूमि से लोग गांवों से आते हैं…।''

PIL के दुरुपयोग पर चिंता

जनहित याचिका के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए प्रधान न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि इस याचिका को सीधे खारिज कर देना चाहिए था, क्योंकि केवल किसी अखबार में प्रकाशित लेख कैसे याचिका दायर करने का आधार बन सकता है? पीठ ने कहा, ''पीआईएल दाखिल करने के लिए लेख प्रकाशित कराना आसान है।'' गुप्ता ने दलील दी कि याचिकाकर्ता के मामला दायर करने के अधिकार/योग्यता का सवाल अब प्रासंगिक नहीं रह गया है, क्योंकि यह मामला तीन-न्यायाधीशों की पीठ से होकर पांच-न्यायाधीशों की पीठ तक पहुंचा, जिसने इस पर निर्णय दिया और इसे विचार योग्य मामला माना।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय मामले में की गई कुछ टिप्पणियों के आधार पर इस मामले को नौ-सदस्यीय संविधान पीठ को भेजने का औचित्य क्या है। वकील ने आगे कहा कि यदि सबरीमला का फैसला पलट दिया जाता है, तो कई दमनकारी परंपराएं फिर से बहाल हो जाएंगी। पांच-सदस्यय संविधान पीठ ने सितंबर 2018 में 4:1 के बहुमत से दिए गए अपने फैसले में शबरिमला अयप्पा मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी और अपने फैसले में कहा था कि सदियों पुरानी यह हिंदू धार्मिक प्रथा गैर-कानूनी और असंवैधानिक है।