अमेरिका-ईरान टॉक्स में 'डाकघर' से ज्यादा कुछ नहीं पाकिस्तान; एक्सपर्ट ने शहबाज-मुनीर के धागे खोल दिए
अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम की घोषणा के बाद अनुभवी राजनयिक विद्या भूषण सोनी ने पाकिस्तान की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के खिलाफ चेतावनी दी है। उन्होंने पाकिस्तान को रणनीतिक वार्ताकार की बजाय केवल एक संदेशवाहक या डाकघर करार दिया है।

अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम की घोषणा के बाद एक्स डिप्लोमेट विद्या भूषण सोनी ने पाकिस्तान की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने पाकिस्तान को रणनीतिक वार्ताकार की बजाय केवल एक 'संदेशवाहक' या 'डाकघर' करार दिया है। न्यूज एजेंसी एएनआई से विशेष बातचीत में सोनी ने कहा कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा आगामी शांति वार्ताओं में इस्लामाबाद की भागीदारी को लेकर किए जा रहे दावों को अतिरंजित नहीं मानना चाहिए। सोनी ने स्पष्ट किया कि भले ही पाकिस्तान खुद को प्रमुख शांतिदूत के रूप में प्रस्तुत कर रहा हो, लेकिन उसकी वास्तविक भूमिका काफी सीमित है।
सोनी ने कहा कि अमेरिका बेहतर विकल्पों की कमी के कारण उपलब्ध किसी भी माध्यम से संपर्क साधकर हाथ-पैर मार रहा है। इस्लामाबाद के बाहर स्वतंत्र प्रयास भी जारी हैं। पाकिस्तान जो चाहे दावा कर ले, लेकिन अमेरिका किसी भी छोटी सी उम्मीद की किरण को पकड़ लेगा क्योंकि उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
उन्होंने मिस्र, तुर्की और पाकिस्तान की 'त्रिमूर्ति' को 'डाकघर' की संज्ञा देते हुए आरोप लगाया कि ये देश वाशिंगटन और तेहरान के बीच केवल संदेशों का आदान-प्रदान कर रहे हैं, बिना कोई नया विचार या मूल्य जोड़े। सोनी ने कहा कि वे असल में वार्ताकार या मध्यस्थ नहीं हैं, बल्कि सिर्फ डाकघर की तरह काम कर रहे हैं। दोनों पक्षों को स्वीकार्य बनाने के लिए कोई नया सुझाव नहीं दे रहे, केवल संदेश पहुंचा रहे हैं।
इसके बावजूद सोनी ने शांति प्रयासों के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा युद्धविराम जमीनी स्तर पर चल रही पहलों को गति देने का अवसर प्रदान करता है। शांति के प्रयास जारी रहने चाहिए। एक बार युद्धविराम पर सहमति बन जाने के बाद जमीनी प्रयासों को बढ़ावा मिल सकता है। पाकिस्तान अपनी भूमिका निभाता रहेगा, लेकिन इसे मध्यस्थ या मुख्य भूमिका के रूप में बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखना चाहिए।
भारत की भूमिका पर सोनी ने कहा कि नई दिल्ली को पाकिस्तान की इस भागीदारी पर संवेदनशील नहीं होना चाहिए। शांति के लिए कोई भी प्रयास मानवता और विश्व शांति के हित में है। हम इसके पक्ष या विपक्ष में नहीं हैं। अगर यह कारगर साबित होता है तो अच्छी बात है, वरना इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती।




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