इस CM के खिलाफ 40 से ज्यादा Ex IAS, डॉक्टरों और लेखकों ने खोला मोर्चा; चीफ जस्टिस से क्या गुहार?
विस्तृत ज्ञापन में हस्ताक्षर करने वालों ने कहा कि वे मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में माननीय गुवाहाटी हाई कोर्ट की संवैधानिक भूमिका में गहरे विश्वास के साथ अदालत का रुख कर रहे हैं।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा के खिलाफ 40 से ज्यादा रिटायर्ड नौकरशाहों, शिक्षाविदों, चिकित्सकों, लेखकों, पत्रकारों और जाने-माने नागरिकों ने मोर्चा खोल दिया है। इन लोगों ने गुवाहाटी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को चिट्ठी लिखकर अपील की है कि वह मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा के नफरती भाषणों के बार-बार होने वाले मामलों और एक खास समुदाय के खिलाफ हालिया बयानों पर स्वत: संज्ञान लें। चिट्ठी में इन लोगों ने कहा है कि ''संवैधानिक उल्लंघनों के खिलाफ चुप्पी या निष्क्रियता'' संविधान की नैतिक शक्ति को कमजोर कर सकती है।
गुरुवार को हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आशुतोष कुमार को लिखे पत्र में, इन नागरिकों ने शर्मा के कई सार्वजनिक बयानों की ओर उच्च न्यायालय का ध्यान दिलाया, ''जो प्रथम दृष्टया नफरती भाषण, सरकारी धमकी और एक खास समुदाय को खुलेआम बदनाम करने जैसे हैं।'' पत्र में मुख्यमंत्री की 'मियां' (बांग्ला भाषी मुसलमानों) के खिलाफ टिप्पणियों का जिक्र किया गया है। चिट्ठी में इन प्रबुद्ध नागरिकों ने चीफ जस्टिस से मामले में संज्ञान लेने और दखल देने की मांग की है।
CM का बयान संविधान की भावना के खिलाफ
पत्र में कहा गया कि बांग्ला भाषी मुसलमान 100 से ज्यादा वर्षों में "व्यापक तौर पर असमिया समाज का हिस्सा" बन गए हैं, और मुख्यमंत्री शर्मा के बयान ''अमानवीय, सामूहिक रूप से बदनामी और राज्य प्रायोजित उत्पीड़न की धमकियों वाले प्रतीत होते हैं, जो संविधान की भावना के खिलाफ है।'' बता दें कि 'मियां' मूल रूप से असम में बांग्ला भाषी मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक अपमानजनक शब्द है। गैर-बांग्ला भाषी लोग इन लोगों को आमतौर पर बांग्लादेशी प्रवासी के रूप में पहचानते हैं।
चिट्ठी पर दस्तखत करने वालों में कौन-कौन?
हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लिखी चिट्ठी पर साइन करने वालों में जाने-माने विद्वान डॉ. हिरेन गोहेन, असम के पूर्व DGP हरेकृष्ण डेका, गुवाहाटी के पूर्व आर्कबिशप थॉमस मेनमपारामपिल, राज्यसभा सांसद अजीत कुमार भुइयां, रिटायर्ड IAS अधिकारी, सीनियर पत्रकार, शिक्षाविद, कलाकार और असम के सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। एक विस्तृत ज्ञापन में हस्ताक्षर करने वालों ने कहा कि वे मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में माननीय गुवाहाटी हाई कोर्ट की संवैधानिक भूमिका में गहरे विश्वास के साथ अदालत का रुख कर रहे हैं।
धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने का निर्देश दें
पत्र में हाई कोर्ट से उचित मामले दर्ज करने, प्रभावित समुदाय की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करने, सार्वजनिक पद धारकों के लिए संवैधानिक अनुशासन की पुष्टि करने और धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने का निर्देश देने का आग्रह किया गया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने लगातार संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना है। (भाषा इनपुट्स के साथ)




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