खुद को भगवान समझ बैठे हैं मिलॉर्ड, कोर्ट में दबंगई करते हैं जज; तुषार मेहता ने ऐसा क्यों कहा
तुषार मेहता ने अपनी अपनी किताब ‘The Bench, the Bar and the Bizarre’ में में विदेशी अदालतों के उदाहरणों का सहारा लेकर भारतीय न्यायपालिका को आईना दिखाने की कोशिश की है।

देश के दूसरे सबसे लंबे समय तक सॉलिसिटर जनरल (SG) ऱहे तुषार मेहता ने अपनी नई किताब में अदालतों के एक ऐसे पहलू पर प्रहार किया है, जिस पर अक्सर खामोशी बरती जाती है। मेहता का तर्क है कि वकीलों द्वारा जजों के प्रति दिखाए जाने वाले अत्यधिक सम्मान ने कुछ जजों के भीतर देवत्व का झूठा अहसास भर दिया है। उनके अनुसार, इसी भावना के कारण कुछ जज अदालतों में 'दबंग' या 'बुली' में तब्दील हो गए हैं।
तुषार मेहता ने अपनी अपनी किताब ‘The Bench, the Bar and the Bizarre’ में में विदेशी अदालतों के उदाहरणों का सहारा लेकर भारतीय न्यायपालिका को आईना दिखाने की कोशिश की है। वे लिखते हैं कि न्यायिक दबंगई कई रूपों में सामने आती है। उनके अनुसार, कुछ न्यायाधीश वकीलों की दलीलों में लगातार टोका-टाकी करते हैं। कई जज कठोरता की सीमा लांघकर वकीलों को अपमानित करने पर उतर आते हैं। कोर्टरूम में शक्ति का संतुलन पूरी तरह जज के पक्ष में होता है, जिससे वकीलों के पास विरोध के विकल्प सीमित हो जाते हैं।
झुककर कहना पड़ता है मिलॉर्ड
उन्होंने अदालतों में इस्तेमाल होने वाली औपचारिक भाषा पर भी कटाक्ष किया है। उन्होंने बताया कि कैसे एक वकील को स्पष्ट कानूनी विसंगति दिखने पर भी झुककर 'मिलॉर्ड' कहना पड़ता है। वकील सीधे तौर पर जज की बात को गलत नहीं कह सकता, बल्कि उसे हुजूर की दयालु अनुमति के साथ एक वैकल्पिक प्रस्ताव पेश करने की स्वतंत्रता मांगनी पड़ती है।
जज के मामले में असहाय हो जाती है जनता
मेहता कहते हैं कि जनता एक अहंकारी राजनेता को तो वोट देकर हटा सकती है, लेकिन एक अहंकारी जज के मामले में वह असहाय होती है। उन्होंने दिवंगत अरुण जेटली के प्रसिद्ध वाक्यांश "गैर-निर्वाचितों की तानाशाही" की याद दिलाते हुए लिखा कि न्यायाधीश सीधे तौर पर जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होते, इसलिए उनका आदर्श आचरण से भटकना पूरी संस्था के विश्वास को खत्म कर सकता है।
सहानुभूति भी जताई
कड़ी आलोचना के बावजूद मेहता ने जजों के प्रति सहानुभूति भी जताई है। उन्होंने स्वीकार किया कि जज अत्यंत कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। उन्होंने कहा कि जजों पर मुकदमों का इतना दबाव है कि वह उनके संसाधनों और बुनियादी ढांचे की तुलना में कहीं अधिक है। विशेष रूप से ट्रायल कोर्ट के जजों का वेतन महंगाई के अनुपात में कम है। अदालतों में अव्यवस्थित माहौल, चिड़चिड़े वकील और अनुचित मुकदमों के बीच संयम बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है। मेहता स्पष्ट करते हैं कि ये कठिनाइयां अदालत कक्ष में अभद्र व्यवहार का बहाना नहीं हो सकतीं।
किताब में यह भी उल्लेख किया गया है कि जज को राज्य की सबसे सम्मानित शाखा माना जाता है। मेहता के अनुसार, यह सम्मान दो तरह से मिल सकता है। अदालत की अवमानना जैसे कि डंडे के जोर पर निकाला गया सम्मान। सच्चा विश्वास जो कि निष्पक्षता, तटस्थता और वकीलों व पक्षकारों के साथ सभ्य व्यवहार के माध्यम से अर्जित किया गया सम्मान है।
उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई है कि दुनियाभर के जजों ने हमेशा अपने कामकाज की बाहरी निगरानी या शिकायतों के लिए किसी तंत्र का विरोध किया है, जिसे वे न्यायपालिका की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप मानते हैं।
वकीलों की लाचारी
सॉलिसिटर जनरल ने अपनी पुस्तक में वकीलों की दुविधा को बखूबी उभारा है। यदि कोई जज अभद्र व्यवहार करता है, तो वकील के पास बहुत कम विकल्प होते हैं। अगर वह उसी भाषा में जवाब देता है तो न केवल उसके मुवक्किल का हित प्रभावित होता है, बल्कि वकील के अपने पेशेवर अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगता है। ऐसे में अक्सर किसी साहसी मुवक्किल को ही उच्च अधिकारियों तक शिकायत लेकर जाना पड़ता है।




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