मालदीव ने चीन को सौंपा प्रोजेक्ट, अब भारत से मांगी कर्ज चुकाने की मोहलत; बुरे फंसे मुइज्जू
मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू ने थिलाफुशी पोर्ट का काम चीन को सौंप दिया है। वहीं देश का खजाना खाली होने पर 400 मिलियन डॉलर के कर्ज को चुकाने के लिए भारत से 3 साल की मोहलत मांग रहे हैं। जानें इस कूटनीतिक 'डबल गेम' की पूरी इनसाइड स्टोरी।

मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की सरकार इन दिनों गहरे आर्थिक और कूटनीतिक संकट में फंसी नजर आ रही है। एक तरफ मालदीव का खजाना खाली हो रहा है और वह भारत से कर्ज चुकाने के लिए अतिरिक्त समय की गुहार लगा रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह भारत के सामरिक हितों को नजरअंदाज करते हुए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट चीन को सौंप दिया। 5 फरवरी 2026 को मालदीव पोर्ट्स लिमिटेड (MPL) ने थिलाफुशी पोर्ट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के पहले चरण का काम चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी (CHEC) को सौंप दिया था।
थिलाफुशी पोर्ट प्रोजेक्ट: चीन को सौंपा पहला चरण
5 फरवरी को माले में MPL मुख्यालय में एक औपचारिक समारोह में MPL के सीईओ मोहम्मद रिशवान और CHEC के कंट्री मैनेजर माओ बाओ ने समझौते पर दस्तखत किए। यह थिलाफुशी पोर्ट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट- लोकल हार्बर रिलीफ प्रोजेक्ट का पहला चरण है, जिसमें डिजाइन, सर्वे और जियो-टेक्निकल स्टडी शामिल हैं। काम 5 महीने में पूरा करने का लक्ष्य है। राष्ट्रपति मुइज्जू ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए घोषणा की कि माले का कमर्शियल पोर्ट नवंबर 2027 तक थिलाफुशी में शिफ्ट हो जाएगा। इसका मकसद माले पोर्ट पर लंबे समय से चली आ रही भीड़-भाड़ कम करना और देश की पोर्ट क्षमता बढ़ाना है। पहले चरण में 650 मीटर क्वे वॉल, 125 मीटर हार्बर, एक्स-रे फैसिलिटी, ऑटोमेटेड सिस्टम और बॉन्डेड वेयरहाउस का डिजाइन शामिल है।
भारत का ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट (GMCP): थिलाफुशी से जोड़ने वाला पुल
यह फैसला इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि भारत पहले से ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट (GMCP) पर काम कर रहा है- यह मालदीव का सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है। भारत ने इसमें तगड़ा पैसा लगाया है। लगभग 500 मिलियन डॉलर। जिसमें 400 मिलियन डॉलर लाइन ऑफ क्रेडिट और 100 मिलियन डॉलर मदद शामिल है। यह 6.7 किलोमीटर लंबा ब्रिज और कॉजवे नेटवर्क माले को विलिंगिली, गुल्हिफाल्हु और थिलाफुशी से जोड़ेगा। GMCP का मुख्य उद्देश्य ही थिलाफुशी इंडस्ट्रियल जोन और प्रस्तावित पोर्ट को माले से जोड़कर अर्थव्यवस्था को बूस्ट देना और माले पोर्ट की भीड़ कम करना था। भारतीय कंपनी अफकॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर इसे बना रही है। 2019-2020 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट को भारत ने मालदीव की अर्थव्यवस्था को नेशनल इकोनॉमिक इंजन बनाने के लिए डिजाइन किया था। थिलाफुशी पोर्ट का विकास भारत-मालदीव विजन डॉक्यूमेंट में भी शामिल था। अब चीन को पोर्ट का डेवलपमेंट सौंपने से भारत के प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्रभावित हो सकता है, क्योंकि ब्रिज थिलाफुशी पोर्ट से ही जुड़ेगा।
मालदीव का कर्ज संकट: सुकुक चुकाया, लेकिन दबाव बरकरार
मालदीव की खजाने पर दबाव पहले से ही भारी है। अप्रैल 2026 की शुरुआत में सरकार ने 2021 में जारी 500 मिलियन डॉलर का इस्लामिक सुकुक बॉन्ड सफलतापूर्वक चुकाया। सरकार ने सॉवरेन डेवलपमेंट फंड (SDF) और विदेशी मुद्रा भंडार से पैसे निकालकर यह भुगतान किया। मुइज्जू सरकार ने इसे मजबूत वित्तीय प्रबंधन का सबूत बताया, लेकिन विश्लेषक चेताते हैं कि इससे रिजर्व्स पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। इन भारी भरकम भुगतानों ने मालदीव के विदेशी मुद्रा भंडार को लगभग खाली कर दिया है, जिसके कारण उसे अपने द्विपक्षीय ऋणों को चुकाने में पसीने छूट रहे हैं।
भारत से 400 मिलियन डॉलर के कर्ज पर मोहलत की गुहार
भारत ने पिछले सालों में मालदीव को बार-बार सहायता दी है- 2024-2025 में 50 मिलियन डॉलर के ट्रेजरी बिल को कई बार रोल-ओवर किया, 400 मिलियन डॉलर का करेंसी स्वैप समझौता (RBI के साथ) बढ़ाया और कुल 1.4 बिलियन डॉलर से ज्यादा की मदद दी। मुइज्जू सरकार ने इनका इस्तेमाल सुकुक चुकाने और रिजर्व्स मजबूत करने में किया। अब आर्थिक तंगी से मजबूर होकर माले ने एक बार फिर नई दिल्ली का रुख किया है। मालदीव ने भारत से 400 मिलियन डॉलर के कर्ज को चुकाने के लिए 2 से 3 साल का अतिरिक्त समय (Roll-over) मांगा है।
भारत की परेशानी क्या है?
हालांकि, केंद्रीय कैबिनेट ने पहले दो बार (छह-छह महीने) मोहलत दी थी। अब मालदीव 400 मिलियन डॉलर के कर्ज/स्वैप को 2-3 साल और रोल-ओवर करने की मांग कर रहा है। भारत की दिक्कत यह है कि वह पहले ही कई बार मदद कर चुका है, जबकि मुइज्जू सरकार चीन को स्ट्रैटेजिक प्रोजेक्ट सौंप रही है।
'इंडिया आउट' से आर्थिक हकीकत तक
राष्ट्रपति मुइज्जू 2023 चुनाव में 'इंडिया आउट' कैंपेन पर सत्तासीन हुए थे। उन्होंने भारतीय सैन्यकर्मियों की वापसी कराई और चीन की ओर रुख किया। लेकिन 2026 में कर्ज चुकाने के बोझ ने मजबूर किया कि भारत से मदद मांगी जाए। विश्व बैंक और IMF ने चेतावनी दी थी कि 2026 में मालदीव डिफॉल्ट के खतरे में है। चीन ने कुछ लोन रिफाइनेंस किए, लेकिन भारत की मदद बिना शर्त और तुरंत मिली।
मुइज्जू का 'डबल गेम'
राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू इस समय एक बेहद मुश्किल 'डबल गेम' खेलने की कोशिश कर रहे हैं। वे चीन को लुभाने के लिए उसे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण पोर्ट प्रोजेक्ट दे रहे हैं, लेकिन जब देश को दिवालिया होने से बचाने की बात आती है, तो वे भारत की तरफ हाथ फैला रहे हैं। भारत के लिए अब यह तय करना एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती होगी कि क्या वह मालदीव की चीन-परस्त नीतियों के बावजूद उसे 400 मिलियन डॉलर के कर्ज में मोहलत दे, या फिर अपने कड़े रुख से यह संदेश दे कि सामरिक हितों से समझौता करके कोई भी आर्थिक मदद नहीं मिलेगी। क्योंकि जिस थिलाफुशी पोर्ट को जोड़ने के लिए भारत करोड़ों रुपये खर्च करके समुद्र पर पुल और नेटवर्क बना रहा है, उसी पोर्ट का विकास अब एक चीनी कंपनी करेगी। इसका सीधा मतलब है कि भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर का फायदा भविष्य में चीनी कंपनी द्वारा विकसित बंदरगाह को मिलेगा, जो सुरक्षा और सामरिक नजरिए से भारत के लिए चिंता का विषय है।




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