Left Hands in BJP Victory in Bengal Why After All Communist Voters Choose the Saffron Path बंगाल में 'राम' की जीत में 'वाम' का हाथ; आखिर क्यों कम्युनिस्ट वोटरों ने चुनी भगवा राह?, India News in Hindi - Hindustan
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बंगाल में 'राम' की जीत में 'वाम' का हाथ; आखिर क्यों कम्युनिस्ट वोटरों ने चुनी भगवा राह?

वामपंथी समर्थकों का मानना है कि यह विचारधारा का बदलाव नहीं, बल्कि एक युद्ध रणनीति (MMA फाइटर की तरह) है। एक दिन हार मानकर पीछे हटना ताकि भविष्य की बड़ी लड़ाई के लिए बचा जा सके।

Sun, 10 May 2026 09:40 AMHimanshu Jha लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली।
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बंगाल में 'राम' की जीत में 'वाम' का हाथ; आखिर क्यों कम्युनिस्ट वोटरों ने चुनी भगवा राह?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के परिणामों ने न केवल सत्ता बदली है, बल्कि राज्य के दशकों पुराने राजनीतिक समीकरणों को भी उलट दिया है। भाजपा की इस ऐतिहासिक जीत के पीछे एक चौंकाने वाला सच सामने आया है। वामपंथी मतदाताओं का बड़े पैमाने पर भाजपा की ओर झुकाव देखने को मिला है। इसे राज्य में "एबार राम, पोरे बाम" (इस बार राम, अगली बार वाम) के नारे के रूप में देखा जा रहा है।

पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर से ममता बनर्जी को हराने के बाद अपने विजय भाषण में वामपंथी मतदाताओं का विशेष आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, "भवानीपुर में माकपा के पास 13,000 वोट थे, जिनमें से कम से कम 10,000 वोट मुझे मिले। मैं माकपा मतदाताओं का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं।"

क्यों हुआ 'वाम' से 'दक्षिण' की ओर पलायन?

अस्तित्व की लड़ाई: 2011 में सत्ता से हटने के बाद से तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने वामपंथी कार्यकर्ताओं पर कथित तौर पर भारी दबाव बनाया। उनके दफ्तर छीने गए और कई कार्यकर्ताओं को हिंसा का सामना करना पड़ा। ऐसे में वाम समर्थकों ने भाजपा को एक 'लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी' के रूप में देखा, जो उन्हें टीएमसी के खिलाफ सुरक्षा दे सकती थी।

पंचायत चुनाव का टर्निंग पॉइंट: 2018 के पंचायत चुनावों में हुई व्यापक हिंसा और माकपा कार्यकर्ताओं की हत्याओं ने कैडरों को यह विश्वास दिला दिया कि टीएमसी ही उनकी असली दुश्मन है। यहीं से वामपंथी वोटों का भाजपा की ओर स्थानांतरण शुरू हुआ।

केंद्रीय सुरक्षा बलों की भूमिका: चुनाव के दौरान केंद्रीय बलों की भारी तैनाती ने वामपंथी समर्थकों को बिना किसी डर के वोट डालने का साहस दिया। इंडिया टुडे से बात करते हुए माकपा कार्यकर्ताओं ने बताया कि इस बार वे टीएमसी के डर के बिना मतदान कर सके।

वाम का पतन, भाजपा का उदय

पश्चिम बंगाल में वामपंथ का ग्राफ लगातार नीचे गिरा है, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिला। माकपा का वोट शेयर जो 2011 में 41.09% था, वह 2026 के विधानसभा चुनाव में गिरकर मात्र 4.4% रह गया। लोकसभा 2019 में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था। उस समय भी सीताराम येचुरी ने माना था कि वामपंथ का आधार वोट भाजपा की ओर खिसक गया है। 2026 के चुनाव में भाजपा ने जादवपुर, उत्तरपारा और दमदम उत्तर जैसी सीटों पर जीत दर्ज की, जो कभी वामपंथ के गढ़ हुआ करते थे। यहाँ तक कि दीप्सिता धर और मीनाक्षी मुखर्जी जैसे युवा वामपंथी चेहरे भी चुनाव हार गए।

"एबार राम, पोरे बाम"

वामपंथी समर्थकों का मानना है कि यह विचारधारा का बदलाव नहीं, बल्कि एक युद्ध रणनीति (MMA फाइटर की तरह) है। एक दिन हार मानकर पीछे हटना ताकि भविष्य की बड़ी लड़ाई के लिए बचा जा सके। उनका तर्क है कि एक बार टीएमसी सत्ता से बाहर हो गई, तो वे वापस अपने 'लाल झंडे' की ओर लौट आएंगे।

क्या होगा वामपंथ का भविष्य?

टीएमसी की विदाई के बाद अब वामपंथी दल अपने अस्तित्व को फिर से तलाश रहे हैं। सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हो रहे हैं जहां वामपंथी कार्यकर्ता अपने उन दफ्तरों को फिर से खोल रहे हैं जो टीएमसी के कब्जे में थे। कुछ जगहों पर भाजपा नेताओं की मौजूदगी में ये दफ्तर वापस किए गए। हालांकि विधानसभा में वामपंथ की स्थिति कमजोर है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में सुधार दिखा है। माकपा ने मुर्शिदाबाद की डोमकल सीट जीती है, वहीं उनके सहयोगी दल ISF ने भांगड़ सीट पर कब्जा किया है।