Laws have been enacted against violence against women but societal mindset has not changed Supreme Court महिला हिंसा पर कानून तो बने पर समाज की सोच नहीं बदली, सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी, India News in Hindi - Hindustan
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महिला हिंसा पर कानून तो बने पर समाज की सोच नहीं बदली, सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह भी कहा कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पारिवारिक ढांचे में पुरुषों का वर्चस्व आजभी कायम है, जिससे महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं अधिक देखने को मिलती हैं।

Sun, 5 April 2026 06:14 AMHimanshu Jha लाइव हिन्दुस्तान
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महिला हिंसा पर कानून तो बने पर समाज की सोच नहीं बदली, सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी

Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध के लिए भारतीय समाज में गहराई तक अपनी जड़ें जमा चुकी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया। शीर्ष अदालत ने कहा कि दशकों से चले आ रहे कानूनी सुधार, कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं और घरेलू हिंसा और लैंगिक अपराध आज भी व्यापक रूप से जारी हैं।

जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने पत्नी की हत्या के मामले में दोषी व्यक्ति की अपील को खारिज करते हुए यह फैसला दिया। निचली अदालत ने जलाकर पत्नी की हत्या के जुर्म में दोषी ठहराते हुए शंकर को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता के मृत्यु के पहले के बयान के आधार पर दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखते हुए शंकर की अपील खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भारत में एक ओर आर्थिक विकास, शिक्षा का स्तर बढ़ा है और महिलाओं की भागीदारी कार्यक्षेत्र में बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर महिलाओं के खिलाफ हिंसा का जारी रहना एक ‘विरोधाभास’ को दर्शाता है। इस पर नियंत्र जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह भी कहा कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पारिवारिक ढांचे में पुरुषों का वर्चस्व आजभी कायम है, जिससे महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं अधिक देखने को मिलती हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि दशकों तक कानूनों, योजनाओं, सुधारों और कार्यस्थलों, घरों, निजी रिश्तों और यहां तक कि सशस्त्र बलों में भी समानता को न्यायिक मान्यता मिलने के बाद भी, समाज में महिलाओं के जीवन पर नियंत्रण इतना गहरा क्यों बना हुआ है? शायद, इसका जवाब केवल हम, भारत के लोगों के पास ही है।

दहेज जैसी कुप्रथाओं की समाज में स्वीकार्यता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज जैसी कुप्रथाओं को कानून बनाकर प्रतिबंधित किए जाने के बाद समाज में इन्हें स्वीकार्यता प्राप्त है। रूढि़वादी और इन गहरे कलंकपूर्ण विचारों से समाज को मुक्त करने की प्रक्रिया स्वतंत्रता के तुरंत बाद ही शुरू हो गई थी।