karnataka governor gehlot walks out assembly session siddaramaiah speech controversy केंद्र विरोधी 11 पैराग्राफ पर भड़के गवर्नर, 2 लाइनें पढ़कर छोड़ा सदन; अब कर्नाटक में बवाल, India News in Hindi - Hindustan
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केंद्र विरोधी 11 पैराग्राफ पर भड़के गवर्नर, 2 लाइनें पढ़कर छोड़ा सदन; अब कर्नाटक में बवाल

यह घटना दक्षिण भारत में राज्यपालों और गैर-बीजेपी सरकारों के बीच तनाव की नई कड़ी है। इससे पहले तमिलनाडु और केरल में राज्यपालों के साथ भी अभिभाषण को लेकर विवाद हुआ था, जहां वे पूरे भाषण को नहीं पढ़ पाए।

Thu, 22 Jan 2026 12:43 PMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, बेंगलुरु
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केंद्र विरोधी 11 पैराग्राफ पर भड़के गवर्नर, 2 लाइनें पढ़कर छोड़ा सदन; अब कर्नाटक में बवाल

देश में 'राज्यपाल बनाम राज्य सरकार' के टकराव की श्रृंखला में गुरुवार को एक नया अध्याय जुड़ गया। कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने राज्य विधानसभा के बजट सत्र के पहले दिन अपने अभिभाषण की केवल दो पंक्तियां पढ़ीं और सदन से वॉकआउट कर गए। राज्यपाल ने सदस्यों का अभिवादन करने के बाद कहा कि उन्हें संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए प्रसन्नता हो रही है। उन्होंने हिंदी में कहा, ‘मेरी सरकार राज्य के आर्थिक, सामाजिक एवं भौतिक विकास को दोगुना करने के लिए प्रतिबद्ध है। जय हिंद, जय कर्नाटक।’ राज्यपाल द्वारा अपने भाषण को छोटा किए जाने पर कांग्रेस सदस्यों ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की और सदन में इसके खिलाफ नारे लगाए। इस अप्रत्याशित घटना ने सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार और राजभवन के बीच चल रही तनातनी को एक बार फिर जगजाहिर कर दिया है।

विवाद की मुख्य वजह

विवाद की मुख्य वजह राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए अभिभाषण में शामिल 11 पैराग्राफ थे। रिपोर्टों के अनुसार, इन पैराग्राफों में केंद्र सरकार और उसकी नीतियों की तीखी आलोचना की गई थी। सबसे बड़ा विवाद केंद्र सरकार की नई योजना 'विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन' (VB-G RAM G) को लेकर था, जिसने मनरेगा की जगह ली है। कर्नाटक सरकार ने अपने भाषण में इस बदलाव का विरोध किया था और इसे गरीबों के अधिकारों का हनन बताया था।

सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल गहलोत ने भाषण को मंजूरी देने से पहले इन 11 पैराग्राफों को हटाने या बदलने का सुझाव दिया था। हालांकि, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनके मंत्रिमंडल ने भाषण में कोई भी बदलाव करने से इनकार कर दिया। उनका तर्क था कि यह सरकार की नीतियों और विचारों का प्रतिबिंब है, जिसे पढ़ना राज्यपाल का संवैधानिक दायित्व है।

सदन में क्या हुआ?

गुरुवार सुबह जब राज्यपाल गहलोत विधान सौधा (विधानसभा भवन) पहुंचे, तो मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और विधानसभा अध्यक्ष ने उनका स्वागत किया। उम्मीद थी कि पिछले कुछ दिनों से चल रहा गतिरोध खत्म हो जाएगा। राज्यपाल आसन पर गए, उन्होंने सदस्यों को नमस्कार कहा और अभिभाषण की शुरुआती दो पंक्तियां पढ़ीं। इसके तुरंत बाद, उन्होंने भाषण को 'पढ़ा हुआ' मानकर सदन के पटल पर रख दिया और वहां से बाहर निकल गए। इस दौरान कांग्रेस विधायकों ने विरोध प्रदर्शन किया और उन्हें घेरने की कोशिश की, जिससे सदन में हंगामा मच गया।

सीएम ने बोला हमला

गवर्नर के असेंबली से बाहर जाने के बाद, कर्नाटक के CM सिद्धारमैया ने कहा- हर नए साल में गवर्नर को असेंबली के जॉइंट सेशन को संबोधित करना होता है, जिसका भाषण कैबिनेट तैयार करती है। यह एक संवैधानिक जरूरत है। आज, कैबिनेट द्वारा तैयार किया गया भाषण पढ़ने के बजाय, गवर्नर ने वह भाषण पढ़ा जो उन्होंने खुद तैयार किया था। यह भारत के संविधान का उल्लंघन है। यह भारतीय संविधान के आर्टिकल 176 और 163 का उल्लंघन करता है। उन्होंने संविधान के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया है। इसलिए, हम गवर्नर के इस रवैये के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेंगे। हम इस बात की जांच कर रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट जाना है या नहीं।

कर्नाटक के सूचना प्रौद्योगिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी मंत्री प्रियंक खड़गे ने राज्यपाल पर संविधान का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 176 के तहत राज्यपाल को विधानमंडल के पहले सत्र में सरकार के अभिभाषण को पढ़ना अनिवार्य है, और अनुच्छेद 163 के अनुसार वे मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करें। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया।

कांग्रेस नेताओं ने राज्यपाल को घेरा

कांग्रेस विधायक बीके हरिप्रसाद ने कहा- कैबिनेट द्वारा तैयार किए गए भाषण को राज्यपाल का खारिज करने का कोई हक नहीं है। राज्यपाल ने विधानसभा और परिषद के संयुक्त सत्र को संबोधित करने से इनकार कर दिया। बीजेपी द्वारा नियुक्त राज्यपालों के लिए मुख्यमंत्रियों को अपमानित करना एक फैशन बन गया है।

कांग्रेस विधायक रिजवान अरशद ने कहा- आप देख सकते हैं कि केंद्र सरकार और बीजेपी का राज्यपाल पर कितना दबाव है। जब राज्यपाल पहले सत्र के दौरान बयान पढ़ते हैं, तो यह उनका निजी विचार नहीं होता, बल्कि यह सरकार का नीतिगत बयान होता है, जो मंत्रिपरिषद द्वारा राज्य के लोगों के कल्याण के लिए बनाया जाता है। राज्यपाल का संवैधानिक कर्तव्य मंत्रिपरिषद की सलाह का पालन करना है... भाषण न पढ़ना अनुच्छेद 163 का उल्लंघन है... ये सभी चीजें लोकतंत्र को कमजोर करती हैं, और चाहे कोई इसे पसंद करे या नहीं, राज्यपालों को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। मनरेगा की जगह नया कानून लाने से करोड़ों दिहाड़ी मजदूरों पर असर पड़ने वाला है... क्या यह संविधान के खिलाफ है? वे (बीजेपी) आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते, और कोई भी सरकार जो मोदी सरकार को बेनकाब करने के लिए खड़ी होती है... राज्यपाल पर दबाव डालना और राज्यपाल का दबाव स्वीकार करना, यही संविधान का उल्लंघन है... हम संवैधानिक रूप से चुनी हुई सरकार हैं, और हमें कर्नाटक के लोगों के हितों की रक्षा करने का जनादेश मिला है और हमने इस संबंध में एक बयान जारी किया है। अगर राज्यपाल इसे नहीं पढ़ना चुनते हैं, तो हम सभी संवैधानिक संभावनाओं का पता लगाएंगे ताकि राज्य में ऐसा दोबारा न हो।

कांग्रेस सांसद शशिकांत सेंथिल ने कहा- राज्यपाल एक राजनीतिक एजेंट की तरह काम करने की कोशिश कर रहे हैं, और एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार के पहले बयान को पढ़ने से उनका खुला इनकार सिर्फ यह दिखाता है कि यह देश किस दिशा में जा रहा है... अधिनियम को थोड़ा सा भी पढ़ने से पता चल जाएगा कि हम क्या कह रहे हैं...

कर्नाटक के मंत्री दिनेश गुंडू राव ने कहा- अगर राज्यपाल राजनीतिक एजेंटों की तरह काम करने वाले हैं, तो क्या हमें इस संबोधन की भी जरूरत है? कर्नाटक के कानून मंत्री एचके पाटिल ने कहा- आज लोकतंत्र के इतिहास में एक काला दिन है। एक गवर्नर जिसे संविधान का संरक्षक माना जाता है, वह अपना कर्तव्य निभाने में नाकाम रहा है। उसे असेंबली के संयुक्त सत्र को संबोधित करना चाहिए था। उसने संविधान का अपमान किया है। हम उचित फैसला लेंगे।

विपक्ष शासित राज्यों में 'परंपरा तोड़' रहे राज्यपाल?

यह घटना दक्षिण भारत में राज्यपालों और गैर-बीजेपी सरकारों के बीच तनाव की नई कड़ी है। इससे पहले तमिलनाडु में राज्यपाल आर.एन. रवि और केरल में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर के साथ भी अभिभाषण को लेकर विवाद हुआ था, जहां वे पूरे भाषण को नहीं पढ़ पाए।

तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि ने विधानसभा के सत्र की शुरुआत में अपना पारंपरिक अभिभाषण देने से इनकार कर दिया और सदन से वॉकआउट कर गए। राज्यपाल रवि ने दो प्रमुख कारण बताए। पहला, उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रगान का अपमान किया गया (सत्र की शुरुआत में राष्ट्रगान न बजाकर केवल अंत में बजाने की परंपरा पर आपत्ति जताई)। दूसरा, उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा तैयार भाषण में तथ्यात्मक गलतियां थीं और यह भ्रामक था, इसलिए वह इसे नहीं पढ़ सकते। राज्यपाल के जाने के बाद, विधानसभा अध्यक्ष ने तमिल में पूरा भाषण पढ़ा।

केरल में भी विवाद

कर्नाटक और तमिलनाडु में जहां राज्यपालों ने भाषण पढ़ने से ही इनकार कर दिया, वहीं केरल में विरोध का तरीका थोड़ा अलग रहा। 20 जनवरी को केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने विधानसभा में अभिभाषण तो दिया, लेकिन उन्होंने राज्य सरकार द्वारा तैयार भाषण के उन हिस्सों को पढ़ने से छोड़ दिया जिनमें केंद्र सरकार की आलोचना की गई थी।

राज्यपाल ने भाषण के पैरा 12, 15 और 16 को नहीं पढ़ा। इन हिस्सों में केंद्र पर 'वित्तीय संघवाद' को कमजोर करने और राज्य के फंड रोकने के आरोप लगाए गए थे। राज्यपाल के भाषण खत्म करने और सदन से जाने के तुरंत बाद, मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने एक असामान्य कदम उठाया। उन्होंने सदन में खड़े होकर उन सभी 'छूटे हुए' पैराग्राफों को पढ़ा और विधानसभा अध्यक्ष से अनुरोध किया कि कैबिनेट द्वारा मंजूर किए गए मूल भाषण को ही रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए, न कि राज्यपाल द्वारा पढ़े गए संपादित भाषण को।