कहीं फिर हिमंता न पैदा हो जाए? समाजवादी सिद्धा की क्यों हुई छुट्टी और मालदार DK की एंट्री; इनसाइड स्टोरी
सिद्धारमैया सामाजिक न्याय के सबसे बेहतर पैरोकार और शख्सियत रहे हैं, जिन्होंने जाते-जाते भी राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा तैयार की गई बहुप्रतीक्षित जाति जनगणना रिपोर्ट स्वीकार कर लिया है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। लोकभवन को अपना इस्तीफा सौंपने के बाद उन्होंने खुद कहा कि दो दिन पहले कांग्रेस आलाकमान द्वारा दिये गये निर्देश के बाद उन्होंने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। इस मौके पर उन्होंने उन्हें दो बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में लोगों की सेवा करने का अवसर देने के लिए कांग्रेस नेतृत्व यानी सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी को धन्यवाद दिया। हालांकि, पूरे भाषण के दौरान उन्होंने उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार या किसी भी अन्य नेता का नाम अपने उत्तराधिकारी के रूप में लेने से साफ परहेज किया।
अब सियासी हलकों में इसकी चर्चा है कि आखिर 77 वर्षीय पिछड़े समाज से आने वाले समाजवादी नेता सिद्धारमैया की जगह पार्टी ने मलाईदार लेकिन पार्टी के निष्ठावान नेता डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने का यह दांव क्यों खेला है। हालांकि, अभी तक आधिकारिक तौर पर डीके शिवकुमार के अगले मुख्यमंत्री के तौर पर नाम का ऐलान नहीं किया गया है लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि सिद्धारमैया के उत्तराधिकारी वही होंगे। सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद डीके शिवकुमार ने दिल्ली की उड़ान पकड़ ली है।
इस बीच, सियासी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। वरिष्ठ पत्रकार सतीश के सिंह ने एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा कि डीके शिवकुमार को इसलिए कांग्रेस ने समाजवादी बुजुर्ग सिद्धारमैया की जगह चुनना पसंद किया क्योंकि पार्टी को डर सता रहा था कि अगर डीके को मौका नहीं दिया तो कांग्रेस पार्टी में एक और हिमंत बिस्वा सरमा पैदा हो सकता है। यानी असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की तरह पार्टी तोड़कर भाजपा में शामिल हो सकता है। बता दें कि बाजपा में जाने से पहले हिमंता कांग्रेस पार्टी के कद्दावर नेता थे।
सतीश के सिंह ने कहा, “ये बेमौसम फैसला हुआ है, जिसमें एक वयोवृद्ध समाजवादी को हटाकर एक मालदार पूंजीपति को सीएम बनाया जा रहा है। भले ही वो वफादार हैं लेकिन पार्टी को इस बात का डर सता रहा था कि कहीं फिर से कोई हिमंता न पैदा हो जाए।” उन्होंने कहा कि सिद्धारमैया की भाषा से कर्नाटक में कई पटाखे फूटने के संकेत मिल रहे हैं क्योंकि उन्होंने दबाव में इस्तीफा दिया है। सिंह ने कहा कि कांग्रेस पार्टी शुरुआत से ही चाहती थी कि डीके सीएम बनें लेकिन सामाजिक समीकरणों की वजह से ऐसा नहीं कर पा रही थी लेकिन अब जब पार्टी को रिजॉर्ट पॉलिटिक्स वाले को कमान सौंपनी पड़ रही है, जिनके पास करीब 1400 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति है। 2023 के चुनावी हलफनामे में डीके ने खुद इतनी संपत्ति का ब्यौरा दिया है।
सिंह ने कहा कि सिद्धा जनता परिवार से आए समाजवादी चेहरा थे लेकिन डीके शिवकुमार पूंजीपति चेहरा हैं। चूंकि पार्टी को सियासी लड़ाई के लिए पैसे की भी जरूरत है तो इसलिए सिद्धा की जगह डीके पार्टी के लिए ज्यादा मुनासिब लग रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर आप सामाजिक न्याय की बात करें तो तमाम पार्टियों के ऐसे चेहरों में सिद्धारमैया सामाजिक न्याय के सबसे बेहतर पैरोकार और शख्सियत रहे हैं, जिन्होंने जाते-जाते भी पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट स्वीकार कर ली है। सिद्धारमैया ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा तैयार की गई बहुप्रतीक्षित सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण (जाति जनगणना) रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है। इसे उनके राजनीतिक करियर का एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है, क्योंकि उनका 'अहिंदा' (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) राजनीति को मजबूत करने का पुराना लक्ष्य है। इस रिपोर्ट में राज्य में पिछड़ों के कोटे को 32 फीसदी से बढ़ाकर 51 फीसदी तक करने का सुझाव दिया गया है।




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