India has come close to demonstrating technology to refuel satellites in orbit अंतरिक्ष में एक और कारनामा करने वाला है भारत; अब तक चीन ही कर पाया, अमेरिका भी नहीं, India News in Hindi - Hindustan
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अंतरिक्ष में एक और कारनामा करने वाला है भारत; अब तक चीन ही कर पाया, अमेरिका भी नहीं

AyulSAT टारगेट उपग्रह के रूप में काम करेगा, जो अंतरिक्ष में ईंधन हस्तांतरण की प्रक्रिया की पुष्टि करेगा। यह दो अलग-अलग अंतरिक्ष यानों के बीच जटिल सर्विसिंग की बजाय एक ही उपग्रह के अंदर आंतरिक ईंधन ट्रांसफर पर केंद्रित है।

Mon, 12 Jan 2026 09:08 AMNiteesh Kumar लाइव हिन्दुस्तान
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अंतरिक्ष में एक और कारनामा करने वाला है भारत; अब तक चीन ही कर पाया, अमेरिका भी नहीं

भारत अंतरिक्ष में उपग्रहों को कक्षा में ही ईंधन भरने की तकनीक प्रदर्शित करने के करीब पहुंच गया है। अगर यह मिशन सफल होता है तो भारत दुनिया का दूसरा देश बन जाएगा, जिसने इस खास टेक्नोलॉजी को सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया है। वर्तमान में केवल चीन ने ही पिछले साल इस तरह का प्रदर्शन किया था। अमेरिका सहित अन्य अंतरिक्ष शक्तियां अभी तक इसे सार्वजनिक रूप से सफल नहीं कर पाई हैं। यह उपलब्धि बेंगलुरु स्थित स्पेस स्टार्टअप OrbitAID Aerospace की 25 किलोग्राम वजनी AyulSAT सैटेलाइट के माध्यम से हासिल होने वाली है, जो इसरो के PSLV-C62 रॉकेट से 12 जनवरी 2026 को लॉन्च होने वाला है।

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AyulSAT मुख्य रूप से एक टारगेट उपग्रह के रूप में काम करेगा, जो अंतरिक्ष में ईंधन हस्तांतरण की प्रक्रिया को सत्यापित करेगा। यह दो अलग-अलग अंतरिक्ष यानों के बीच जटिल सर्विसिंग की बजाय एक ही उपग्रह के अंदर आंतरिक ईंधन ट्रांसफर पर केंद्रित है। लॉन्च के चार घंटे के भीतर पहला रिफ्यूलिंग टेस्ट होने की उम्मीद है। इस प्रयोग से वैज्ञानिकों को शून्य गुरुत्वाकर्षण में तरल पदार्थों के व्यवहार को वास्तविक कक्षा की स्थिति में अध्ययन करने का मौका मिलेगा।

कितना अहम है यह मिशन

OrbitAID के संस्थापक और सीईओ शक्तिकुमार आर के अनुसार, यह भारत की पहली कमर्शियल डॉकिंग और रिफ्यूलिंग इंटरफेस होगी, जो भविष्य में उपग्रहों की आयु बढ़ाने, स्पेस डेब्री कम करने और सस्टेनेबल स्पेस मिशनों के लिए आधार तैयार करेगी। इस मिशन की सफलता से भारत अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में नया अध्याय लिखेगा। उपग्रहों का जीवनकाल ईंधन खत्म होने पर सीमित हो जाता है, लेकिन ऑन-ऑर्बिट रिफ्यूलिंग से उन्हें लंबे समय तक काम करने लायक बनाया जा सकेगा, जिससे लॉन्च की लागत और स्पेस कचरा दोनों कम होगा। यह ISRO और निजी स्टार्टअप्स के सहयोग का बेहतरीन उदाहरण है।