कैसे होता है दलाई लामा का चयन, आत्मा खोजने जाती है टीम; चीन चुनने पर अड़ा
चीन का कहना है कि पुराने समय से ही दलाई लामा को चुनने का अधिकार उसके नेताओं के पास है। इस परंपरा के तहत सोने के कलश में से संभावित नामों को निकाला जाता है। इसकी शुरुआत 1793 में किंग राजवंश के समय हुई थी।

बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा के उत्तराधिकारी चुने जाने की चर्चा है। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है, लेकिन खुद धर्मगुरु ने अपनी किताब में संकेत दिए थे कि जब वह 90 साल के हो जाएंगे, तो उत्तराधिकारी के बारे में जानकारी देंगे। खास बात है कि उत्तराधिकारी का चुना जाना चीन, भारत और अमेरिका के लिए भी अहम है।
कैसे चुने गए थे दलाई लामा
तिब्बती परंपरा के अनुसार, जब किसी वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु का निधन होता है, तो उनकी आत्मा फिर जन्म लेती है। अब 14वें दलाई लामा का जन्म 6 जुलाई 1935 को हुआ था। पूर्व उत्तरी तिब्बत में वह एक कृषि परिवार में जन्में और नाम ल्हामो थोंधुप रखा गया। उनकी पहचान पुनर्जन्म लेने वाली उस आत्मा के रूप में हुई थी।
तब तिब्बत सरकार की तरफ से भेजे गए एक दल ने कई संकेत मिलने के बाद उनकी पहचान की थी। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, दल ने देखा था कि 13वें दलाई लामा की चीजें देखकर बच्चे ने कहा था कि ये मेरी हैं, ये मेरी हैं। 1940 में ल्हामो थोंधुप को ल्हासा के पोटाला महल में ले जाया गया था और तिब्बती जनता का आध्यात्मिक गुरु घोषित कर दिया गया था।
कैसे होगा अगले दलाई लामा का चयन
मार्च 2025 में रिलीज हुई किताब Voice for the Voiceless में दलाई लामा लिखते हैं कि उनका उत्तराधिकारी चीन के बाहर पैदा होगा। निर्वासित तिब्बती संसद ने कहा कि निर्वासित सरकार को अपना काम जारी रखने क लिए एक सिस्टम तैयार किया गया है। जबकि, गादेन फोदरांग फाउंडेशन के अधिकारियों के पास उनके उत्तराधिकारी को खोजने और पहचानने का जिम्मा होगा।
इस फाउंडेशन की स्थापना साल 2015 में हुई थी। उनके कई भरोसेमंद इस फाउंडेशन के वरिष्ठ अधिकारी हैं।
चीन का दखल
चीन का कहना है कि पुराने समय से ही दलाई लामा को चुनने का अधिकार उसके नेताओं के पास है। इस परंपरा के तहत सोने के कलश में से संभावित नामों को निकाला जाता है। इसकी शुरुआत 1793 में किंग राजवंश के समय हुई थी। अब कई तिब्बती इस बात पर संदेह जताते हैं कि उत्तराधिकारी के चयन के नाम पर समुदाय पर अपना प्रभाव बढ़ाने की यह चीन की चाल है।
भारत और अमेरिका
कई भारतीयों को दलाई लामा में श्रद्धा है और रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कई जानकार मानते हैं कि भारत में उनकी मौजूदगी चीन के खिलाफ नई दिल्ली को बढ़त देती है। वहीं, अमेरिका भी बार-बार कह चुका है कि वह तिब्बतियों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए तैयार है। अमेरिका सांसद भी कह चुके हैं कि वह दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चुनने में चीन का प्रभाव नहीं पड़ने देंगे।




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