Has Election Commission Crossed All Limits Supreme Court to Deliver Major Verdict on SIR Today क्या चुनाव आयोग ने लांघ दी सारी सीमाएं? SIR पर आज सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा बड़ा फैसला, India News in Hindi - Hindustan
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क्या चुनाव आयोग ने लांघ दी सारी सीमाएं? SIR पर आज सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा बड़ा फैसला

वरिष्ठ वकीलों के माध्यम से चुनाव आयोग ने अपनी कार्रवाई को संवैधानिक रूप से अनिवार्य बताया। आयोग का तर्क है कि वह नागरिकता तय नहीं कर रहा था, बल्कि केवल यह सुनिश्चित कर रहा था कि गैर-नागरिक वोट न डाल सकें।

Wed, 27 May 2026 04:31 AMHimanshu Jha लाइव हिन्दुस्तान
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क्या चुनाव आयोग ने लांघ दी सारी सीमाएं? SIR पर आज सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट बुधवार को एक ऐसे मामले में अपना फैसला सुनाने जा रहा है, जिसे संविधान लागू होने के बाद से देश की चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची के ढांचे की सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक समीक्षा माना जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की पीठ इस पर अपना निर्णय देगी कि क्या चुनाव आयोग द्वारा बिहार, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में चलाया गया विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान कानूनी रूप से वैध था या नहीं।

निर्वाचन आयोग ने 24 जून 2025 को बिहार से इस विशेष अभियान की शुरुआत की थी, जिसे बाद में पश्चिम बंगाल सहित कई अन्य राज्यों में विस्तार दिया गया। इसके तहत उन मतदाताओं से दस्तावेजी सबूत मांगे गए जिनका रिकॉर्ड 2002 या 2003 की मतदाता सूची में नहीं मिल रहा था। शुरू में 11 श्रेणियों के दस्तावेज मांगे गए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इसमें आधार, राशन कार्ड और वोटर आईडी को भी शामिल किया गया।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस प्रक्रिया ने चुनाव आयोग को वास्तव में नागरिकता सत्यापन प्राधिकरण में बदल दिया। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) और विपक्षी नेताओं जैसे कि मनोज झा, केसी वेणुगोपाल और महुआ मोत्रा द्वारा दायर याचिकाओं में कई चिंताएं जताई गईं।

अकेले पश्चिम बंगाल में अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले 91 लाख से अधिक (करीब 11.88%) मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह लाल बाबू हुसैन बनाम चुनाव पंजीकरण अधिकारी (1995) के फैसले का उल्लंघन है। पुराने नियम के मुताबिक, अगर नाम सूची में है तो उसे भारतीय नागरिक माना जाता है लेकिन SIR ने नागरिकों पर ही अपनी नागरिकता साबित करने का बोझ डाल दिया। दलील दी गई कि नागरिकता तय करने का अधिकार केंद्र सरकार और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल का है, चुनाव आयोग का नहीं।

बचाव में चुनाव आयोग ने क्या कहा?

वरिष्ठ वकीलों के माध्यम से चुनाव आयोग ने अपनी कार्रवाई को संवैधानिक रूप से अनिवार्य बताया। आयोग का तर्क है कि वह नागरिकता तय नहीं कर रहा था, बल्कि केवल यह सुनिश्चित कर रहा था कि गैर-नागरिक वोट न डाल सकें। आयोग ने इसे एक उदार प्रक्रिया बताया जिसका उद्देश्य मृत, डुप्लिकेट या प्रवासी मतदाताओं के नाम हटाना था। उन्होंने कहा कि इसमें कोई पुलिस जांच शामिल नहीं थी, बल्कि बूथ स्तर के अधिकारियों (BLO) द्वारा घर-घर जाकर सत्यापन किया गया।

सुप्रीम कोर्ट की अब तक की भूमिका

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग की शक्तियां असीमित नहीं हो सकतीं और उन्हें पारदर्शिता व प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना होगा। कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेशों में सामूहिक समावेशन न कि सामूहिक निष्कासन के सिद्धांत पर जोर दिया था।

पश्चिम बंगाल में शिकायतों को सुनने के लिए कोर्ट ने 700 न्यायिक अधिकारियों और रिटायर हाई कोर्ट जजों की अध्यक्षता में 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल भी गठित किए थे।

इस फैसले का महत्व क्यों है?

बुधवार को आने वाला फैसला न केवल SIR की वैधता तय करेगा, बल्कि कई बड़े संवैधानिक सवालों के जवाब भी देगा। क्या वोट देने का अधिकार केवल एक कानूनी अधिकार है या इसे अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है? मतदाता सूची तैयार करने में चुनाव आयोग की शक्तियों की सीमा क्या है? क्या चुनाव आयोग किसी व्यक्ति को नागरिकता के संदेह के आधार पर मतदाता सूची से हटा सकता है?

चूंकि पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में चुनाव इसी संशोधित सूची के आधार पर संपन्न हो चुके हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य की चुनावी प्रक्रिया और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की दिशा तय करेगा।