From Anurag Thakur goli maro speeches to corona jihad, 7 hate speech cases dismissed by Supreme Court know why अनुराग ठाकुर के 'गोली मारो' से 'कोरोना जिहाद' तक, नफरती भाषणों के खिलाफ सात अर्जी SC में खारिज; कोर्ट ने क्या कहा?, India News in Hindi - Hindustan
More

अनुराग ठाकुर के 'गोली मारो' से 'कोरोना जिहाद' तक, नफरती भाषणों के खिलाफ सात अर्जी SC में खारिज; कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने नफरती भाषण से संबंधित याचिकाओं पर अपने फैसले में कहा कि यह कहना सही नहीं है कि नफरती भाषण से निपटने के लिए कोई कानून नहीं है।

Thu, 30 April 2026 05:54 PMPramod Praveen पीटीआई, नई दिल्ली
share
अनुराग ठाकुर के 'गोली मारो' से 'कोरोना जिहाद' तक, नफरती भाषणों के खिलाफ सात अर्जी SC में खारिज; कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के विवादित और कथित नफरती बोल 'देश के गद्दारों को, गोली मारो.... को' से लेकर छह अन्य नफरती भाषणों के खिलाफ दायर अर्जियों पर सुनवाई करते हुए उन्हें खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने बुधवार (29 अप्रैल) को कहा कि नफरत फैलाने वाले भाषणों के मुद्दे से निपटने के लिए मौजूदा आपराधिक कानून पर्याप्त हैं, इसीलिए इसमें हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने नफरती भाषण से संबंधित याचिकाओं पर अपने फैसले में कहा कि यह कहना सही नहीं है कि नफरती भाषण से निपटने के लिए कोई कानून नहीं है।

कोर्ट ने नफरती भाषणों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई और ऐसे मामलों से निपटने के लिए एक तंत्र बनाने के अनुरोध वाली याचिकाओं पर अपना ये फैसला सुनाया है। पीठ ने हेट स्पीच को नियंत्रित करने में न्यायिक शक्तियों के दायरे को स्पष्ट करते हुए कहा कि ऐसे अपराधों से निपटने के लिए मौजूदा आपराधिक कानून के प्रावधान ही काफी हैं, और अदालतें न तो नए अपराध बना सकती हैं और न ही कानून बनाने के लिए बाध्य कर सकती हैं।

ऐसा करते हुए, अदालत ने हेट स्पीच से जुड़े कई हाई-प्रोफ़ाइल मामलों को बंद कर दिया, जिन्होंने सालों तक पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। इन मामलों को या तो तथ्यों के आधार पर, या प्रक्रियागत कारणों से, या फिर इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि समय के साथ ये मुद्दे बेमानी (अप्रासंगिक) हो गए थे। पीठ ने आगे कहा कि उभरती सामाजिक चुनौतियों के आलोक में नये कानून बनाना या पुराने कानूनों में बदलाव करना केंद्र और विधायिका पर निर्भर है। पीठ ने कहा कि वे चाहें तो विधि आयोग की मार्च 2017 की 267वीं रिपोर्ट में दिये गए सुझावों के तहत संशोधन करने पर भी विचार कर सकते हैं।

जस्टिस विक्रम नाथ ने फैसला सुनाते हुए कहा, ''हम उस प्रकार के निर्देश जारी करने से इनकार करते हैं, जिसका अनुरोध किया गया है लेकिन हम यह कहना उचित समझते हैं कि नफरत फैलाने वाले भाषण और अफवाह फैलाने से संबंधित मुद्दा भाईचारे, गरिमा और संवैधानिक व्यवस्था के संरक्षण से सीधे तौर पर जुड़ा है।'' पीठ ने कहा कि अपराध तय करना और दंड का निर्धारण पूरी तरह से विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि संविधान के अनुसार न्यायपालिका कानून नहीं बना सकती और ना ही अपराधों की परिभाषा को अपने आदेशों से व्यापक कर सकती है।

पीठ ने कहा, ''इस न्यायालय के पूर्व निर्णयों से लगातार इसकी पुष्टि होती है कि संवैधानिक अदालतें कानून की व्याख्या कर सकती हैं और मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन को सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी कर सकती हैं, लेकिन वे कानून नहीं बना सकतीं या कानून बनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकतीं।'' पीठ ने कहा कि आपराधिक कानून का मौजूदा ढांचा, जिसमें पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता और संबंधित कानून शामिल हैं, शत्रुता को बढ़ावा देने, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या सार्वजनिक शांति भंग करने वाले कृत्यों से पर्याप्त रूप से निपटता है।

पीठ ने कहा कि पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 के तहत वैधानिक ढांचा मौजूद है, जिससे किसी अपराध पर कानूनी कार्रवाई शुरू की जा सकती है। पीठ ने कहा कि संज्ञेय अपराध का खुलासा होने पर प्राथमिकी दर्ज करना पुलिस का अनिवार्य कर्तव्य है और प्राथमिकी दर्ज नहीं करने की स्थिति में सीआरपीसी या बीएनएसएस प्रभावी उपाय प्रदान करते हैं। इसके साथ ही न्यायालय ने कई याचिकाएं खारिज कर दीं और कुछ राज्यों के अधिकारियों के खिलाफ दायर की गई अलग-अलग अवमानना ​​याचिकाओं को भी बंद कर दिया, जिनमें उन पर घृणास्पद भाषणों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के न्यायालय के निर्देशों का पालन करने में कथित विफलता का आरोप लगाया गया था।

उच्चतम न्यायालय ने 20 जनवरी को इन याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था और टिप्पणी की थी कि वह 2021 से लंबित नफरती भाषणों से जुड़ी अधिकती याचिकाओं को बंद कर देगा, जिनमें अदालत ने पुलिस को स्वतः संज्ञान लेकर प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश दिए थे। नीचे उन सबसे ज़्यादा विवादित मामलों की एक सूची दी गई है, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा निपटाए गए याचिकाओं के इस समूह का हिस्सा थे।

1. BJP सांसद अनुराग ठाकुर और दिल्ली के उप मुख्यमंत्री प्रवेश वर्मा के “गोली मारो” वाला भाषण

2. 'कोरोना जिहाद' मामला, जिसमें कहा गया था कि मुसलमान थूक से कोरोना फैला रहे हैं।

3. 'UPSC जिहाद' मामला

4. तबलीगी जमात घटना से जुड़ी मीडिया कवरेज

5. BJP मंत्री नितेश राणे का भाषण

6. हरिद्वार और दिल्ली धर्म संसद के भाषण

7. नफरती भाषण के 55 अन्य अलग-अलग मामलों की सूची वाला एक समूह