Election Commission clashes with another official Maharashtra CEO raises objection over SIR timeline चुनाव आयोग की एक और ऑफिसर से तकरार, SIR के समय पर भिड़ गए महाराष्ट्र के CEO, India News in Hindi - Hindustan
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चुनाव आयोग की एक और ऑफिसर से तकरार, SIR के समय पर भिड़ गए महाराष्ट्र के CEO

हालांकि निर्वाचन आयोग ने आधिकारिक तौर पर इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन आयोग के सूत्रों का कहना है कि महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में मौजूदा डेटा की मैपिंग का काम शुरू हो चुका है।

Sun, 12 April 2026 06:49 AMHimanshu Jha लाइव हिन्दुस्तान
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चुनाव आयोग की एक और ऑफिसर से तकरार, SIR के समय पर भिड़ गए महाराष्ट्र के CEO

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर अधिकारियों से टकराव की एक और खबर सामने आ रही है। हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी अनुराग यादव के बीच तीखी नोकझोंक हुई थी। ताजा जानकारी जो सामने आ रही है उसके मुताबिक, महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) एस. चोकलिंगम ने पिछले साल नवंबर में ही आयोग को पत्र लिखकर आगाह किया था कि इस पूरी प्रक्रिया के लिए तय समय सीमा बहुत कम है। उन्होंने सुझाव दिया था कि जहां चुनाव सिर पर नहीं हैं, वहां इस काम को पर्याप्त समय लेकर पूरा किया जाना चाहिए।

आपको बता दें कि हल ही में भारत निर्वाचन आयोग ने यूपी कैडर के 2000 बैच के आईएएस अधिकारी अनुराग यादव को पश्चिम बंगाल के कूच बिहार में चुनाव पर्यवेक्षक के पद से हटा दिया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ एक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान हुई तीखी बहस के बाद यह कार्रवाई की गई थी। समीक्षा बैठक के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ने अनुराग यादव से उनके विधानसभा क्षेत्र के पोलिंग स्टेशनों की संख्या पूछी थी। इसका जवाब उन्होंने देरी से दिया। इसके बाद दोनों के बीच बहस हुई। अनुराग यादव ने मुख्य चुनाव आयुक्त को जवाब देते हुए कहा कि वह भी 25 साल से सर्विस में हैं और उनसे इस तरह बात नहीं की जा सकती है। इसे अनुशासनहीनता मानते हुए आयोग ने उन्हें पद से मुक्त कर दिया।

महाराष्ट्र ने क्यों जताई चिंता?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र देश का दूसरा सबसे बड़ा मतदाता आधार वाला राज्य है, जहां 2024 के लोकसभा चुनावों में 9 करोड़ से अधिक मतदाता थे। राज्य के सीईओ ने अपने पत्र में 2001-02 के पुनरीक्षण अभियान का हवाला दिया था। उस समय महाराष्ट्र में यह प्रक्रिया 13 महीनों तक चली थी। अधिकारी का तर्क है कि मतदाता सूची से नाम हटाना एकमात्र उद्देश्य नहीं है, बल्कि सूची को शुद्ध और त्रुटिहीन बनाना है। इसके लिए दावों और आपत्तियों की सुनवाई के लिए पर्याप्त समय अनिवार्य है। महाराष्ट्र ने यह भी मुद्दा उठाया था कि वर्तमान डेटा को पुराने रिकॉर्ड (SIR 2002) के साथ मैप करना एक समय लेने वाली प्रक्रिया है, जिसकी गणना चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों में ठीक से नहीं की गई थी।

पश्चिम बंगाल में संकट, 89 लाख नाम हटे

निर्वाचन आयोग की इस जल्दबाजी का सबसे बुरा असर पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है। राज्य में लगभग 89 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। इनमें से करीब 27.1 लाख मतदाता ऐसे हैं जिनके नाम न्यायिक अधिकारियों द्वारा हटाए गए हैं, लेकिन उनके पास इस फैसले के खिलाफ अपील करने का समय ही नहीं बचा। 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान से पहले इन लाखों लोगों के पास अब अपने मताधिकार खोने का खतरा मंडरा रहा है। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है।

सियासी बयानबाजी तेज

महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष हर्षवर्धन सकपाल ने इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने बताया कि हाल ही में एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्य चुनाव अधिकारी से मुलाकात की थी। सकपाल के अनुसार, "हमने मांग की थी कि पुनरीक्षण प्रक्रिया को 2002 की तर्ज पर कम से कम 13 महीने का समय दिया जाए। अधिकारियों ने हमें आश्वस्त किया कि वे पहले ही केंद्रीय चुनाव आयोग को इस संबंध में पत्र लिखकर जल्दबाजी न करने का अनुरोध कर चुके हैं।"

क्या है चुनाव आयोग का पक्ष?

हालांकि निर्वाचन आयोग ने आधिकारिक तौर पर इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन आयोग के सूत्रों का कहना है कि महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में मौजूदा डेटा की मैपिंग का काम शुरू हो चुका है। चूंकि आगामी महीनों में जनगणना का काम भी शुरू होना है, जिसमें वही सरकारी कर्मचारी और शिक्षक शामिल होंगे जो चुनाव ड्यूटी करते हैं, इसलिए पुनरीक्षण प्रक्रिया में और देरी हो सकती है।