चुनाव कराने की आड़ में विधायी कार्य नहीं कर सकता EC, CJI सूर्यकांत से क्यों बोले AM सिंघवी
पीठ ने EC की शक्तियों की विस्तृत पड़ताल की क्योंकि AM सिंघवी और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि आयोग अपनी संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण कर रहा है और SIR के दौरान नागरिकों पर अनुचित बोझ डाल रहा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि निर्वाचन आयोग चुनाव कराने की ‘आड़’ में संसद और विधानसभाओं के विशुद्ध विधायी कार्यों को अपने हाथों में नहीं ले सकता। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष कई राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के संबंध में निर्वाचन आयोग के फैसले का विरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने ये दलीलें पेश कीं।
पीठ ने निर्वाचन आयोग की शक्तियों की विस्तृत पड़ताल की, क्योंकि सिंघवी और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि आयोग अपनी संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण कर रहा है और एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान नागरिकों पर अनुचित प्रक्रियात्मक बोझ डाल रहा है। सुनवाई के दौरान सिंघवी ने कहा, ‘‘किसी भी मानदंड से यह नहीं कहा जा सकता कि आयोग संविधान की योजना के अंतर्गत विधायी प्रक्रिया में एक तीसरा सदन है। संविधान का एक अंग होने मात्र से उसे विधानमंडलों द्वारा बनाए गए कानून का संदर्भ लिए बिना अपनी इच्छानुसार कानून बनाने की पूर्ण शक्ति नहीं मिल जाती।’’
चुनाव की आड़ में आयोग मूलभूत परिवर्तन कर रहा
संवैधानिक आधार पर दलीलें पेश करते हुए सिंघवी ने कहा, ‘‘निर्वाचन आयोग इसकी आड़ में मूलभूत परिवर्तन कर रहा है...।’’ उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 (चुनावों का पर्यवेक्षण) को अनुच्छेद 327 के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से देखा जाना चाहिए, जो संसद को चुनावों के संबंध में कानून बनाने का अधिकार देता है। सिंघवी ने जून 2025 में जारी किए गए एक फॉर्म पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें सत्यापन के लिए 11 से 12 विशिष्ट दस्तावेजों की आवश्यकता बताई गई थी, और पूछा, ‘‘नियमों में इसका कहां उल्लेख है?’’
BLO तय कर सकता है कोई मानसिक रूप से विक्षिप्त है या नहीं?
वहीं कपिल सिब्बल ने बृहस्पतिवार को अपना पक्ष रखते हुए बूथ स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) की शक्तियों के दायरे पर सवाल उठाते हुए पूछा, ‘‘क्या बीएलओ यह तय कर सकता है कि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से विक्षिप्त है या नहीं?’’ सिब्बल ने कहा, "नागरिकता निर्धारित करने के लिए एक स्कूल शिक्षक को बीएलओ के रूप में तैनात करना, मूल रूप से और प्रक्रियात्मक रूप से, एक खतरनाक और अनुचित प्रस्ताव है।’’
तो शायद आप चूक गए...
सिब्बल ने कहा कि लागू किए जा रहे नियम विदेशी (नागरिक) अधिनियम के नियमों जैसे ही हैं, जहां नागरिकता साबित करने का दायित्व व्यक्ति पर है कि वह विदेशी नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘मैं यह दायित्व कैसे निभाऊंगा जब मेरे पिता ने 2003 की मतदाता सूची के तहत वोट नहीं दिया था या उनकी मृत्यु उससे पहले हो गई थी?’’ इस पर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ‘‘लेकिन अगर आपके पिता का नाम सूची में नहीं है और आपने भी इस पर काम नहीं किया... तो शायद आप चूक गए...।’’ पीठ 2 दिसंबर को सुनवाई फिर से शुरू करेगी।




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