Cockroach Party vs Parasite Front Social media explodes after CJI comments कॉकरोच पार्टी VS पैरासाइट फ्रंट; CJI के विवाद के बाद सोशल मीडिया पर छिड़ी नई जंग, India News in Hindi - Hindustan
More

कॉकरोच पार्टी VS पैरासाइट फ्रंट; CJI के विवाद के बाद सोशल मीडिया पर छिड़ी नई जंग

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की कथित कॉकरोच वाली टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर कॉकरोच पार्टी का सैलाब आया हुआ है। भारतीय लोकतंत्र में तमाम पार्टियों की तरह अब कॉकरोच पार्टी के सामने पैरासाइट फ्रंट आ गया है।

Wed, 20 May 2026 11:54 PMUpendra Thapak लाइव हिन्दुस्तान
share
कॉकरोच पार्टी VS पैरासाइट फ्रंट; CJI के विवाद के बाद सोशल मीडिया पर छिड़ी नई जंग

भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत द्वारा बेरोजगार युवाओं को लेकर की गई कथित कॉकरोच वाली टिप्पणी ने सोशल मीडिया पर उबाल बढ़ा दिया है। कुछ युवा अब सम्मान के साथ खुद को कॉकरोच से जोड़ते हुए रीलें और मीम्स शेयर कर रहे हैं। हालात तब और भी ज्यादा आंदोलनकारी हो गए, जब कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से एक नया सोशल मीडिया पेज बन गया और देखते ही देखते उस पर लाखों की संख्या में फॉलोअर हो गए। इतना ही नहीं इसका सामना करने के लिए दूसरी तरफ नेशनल पैरासिटिक फ्रंट की भी घोषणा एक मीम पेज द्वारा कर दी गई। युवाओं द्वारा बढ़ चढ़कर इन दोनों सोशल मीडिया की दिखावटी पार्टियों में योगदान दिया जा रहा है। अब भले ही यह असली राजनीतिक पार्टियां नहीं हैं, बल्कि मजाक और व्यंग्य के जरिए लोगों की नाराजगी दिखाने का तरीका हैं।

दरअसल इन सभी पार्टियों की शुरुआत सोशल मीडिया पर मीडिया पर दावा किया गया कि बेरोजगार युवाओं को “कॉकरोच” और “पैरासाइट” जैसे शब्दों से संबोधित किया गया। इसके बाद इंटरनेट पर लोगों ने गुस्सा जताने के साथ-साथ मजाकिया अंदाज में एक ऑनलाइन आंदोलन शुरू कर दिया। तो आइए जानते हैं इन पार्टियों के बारे में…

कॉकरोच जनता पार्टी

सीजेआई की टिप्पणी के जवाब में सबसे पहले कॉकरोच जनता पार्टी सामने आई। यह खुद को मजाक में “बेरोजगार और आलसी लोगों की आवाज” बताती है। पार्टी कहती है कि उसका मुख्यालय वहीं है “जहाँ वाई-फाई चलता हो”। इसकी वेबसाइट और सोशल मीडिया पोस्ट किसी राजनीतिक पार्टी से ज्यादा जेनजी कॉमेडी शो जैसी लगती हैं।

इस पार्टी की शुरुआत 16 मई को एक सोशल मीडिया का काम करने वाले युवा अभिजीत डिपके ने की थी। कुछ ही दिनों में यह एक्स और इंस्टाग्राम पर वायरल हो गई। लाखों लोग इससे जुड़ने लगे और एक छोटा मजाक बड़ा ऑनलाइन ट्रेंड बन गया। अभिजीत डिपके ने कहा कि उन्होंने इसे सिर्फ मजाक के तौर पर शुरू किया था। उनके दिमाग में सवाल आया था “क्या होगा अगर सारे कॉकरोच एक हो जाएँ?” लेकिन बाद में लोगों ने इसे अपनी नाराजगी और भावनाओं से जोड़ लिया। और देखते ही देखते लाखों लोग इससे जुड़ गए।

हालांकि पार्टी खुद को एक सोशल मीडिया शिगूफा बताती है, लेकिन इसके कई मुद्दे असली राजनीति से जुड़े हैं। इसके “मॉक मैनिफेस्टो” में कुछ मांगें रखी गई हैं। जैसे कि रिटायरमेंट के बाद मुख्य न्यायाधीशों को राज्यसभा सीट न मिले, फेक न्यूज फैलाने वाले मीडिया पर कार्रवाई हो, वोट हटाने जैसी गड़बड़ियों पर सख्त कार्रवाई हो, पार्टी बदलने वाले नेताओं पर लंबे समय तक चुनाव लड़ने से रोक लगे और कैबिनेट में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण पर भी बात है। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा और कीर्ति आजाद जैसे नेताओं ने भी इससे जुड़ी पोस्ट शेयर कीं, जिससे इसकी चर्चा और बढ़ गई।

पैरासाइट नेशनल फ्रंट का उदय

भारत जैसे लोकतंत्र में एक पक्ष और सामने से दूसरा सत्ता पक्ष न आए ऐसा नहीं हो सकता। इसी तरीके कॉकरोच पार्टी के जवाब में तुरंत ही पैरासाइट फ्रंट आ गया। यह अपने आपको परजीवियों की पार्टी कहती है। NPF खुद को कॉकरोच जनता पार्टी का मुख्य विरोधी बताता है। उसकी भाषा गंभीर राजनीतिक पार्टियों जैसी लगती है, लेकिन उसका तरीका बिलकुल इंटरनेट वाले तंज का है।यह पार्टी कहती है कि आज के टूटे हुए सिस्टम में आम लोग जैसे-तैसे जी रहे हैं, इसलिए उन्हें “पैरासाइट” कहा जा रहा है।

पैरासाइट पार्टी के घोषणा पत्र के मुताबिक वह ऐसा सिस्टम चाहते हैं। जहां संसद में अपराधी नेता न हों, पढ़े-लिखे लोग राजनीति में आएँ, सड़कें अच्छी हों और इंटरनेट पर छोटा सा काम करने के लिए बार-बार कैप्चा न भरना पड़े। NPF का कहना है कि उन्होंने “पैरासाइट” नाम जानबूझकर चुना, क्योंकि वे सिस्टम का फायदा उठाने नहीं बल्कि उसे बदलने की बात करते हैं।

भारतीय मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने भले ही अपनी टिप्पणी पर सफाई पेश कर दी हो। लेकिन इसने सोशल मीडिया के मीमर्स को को एक नई रौनक दे दी है। इंटरनेट पर मीम्स की बाढ़ आई हुई है और जेनजी इन पार्टियों के जरिए अपनी समस्याओं को उठा रहे हैं। युवाओं ने अपने आप को कॉकरोच के साथ जोड़कर एक नया अभियान खड़ा कर दिया है। इससे न केवल सरकार बल्कि न्यायपालिका पर भी निशाना साधा जा रहा है।