1971 का दर्द नहीं भूला बांग्लादेश, भारत से बढ़ाई दोस्ती; शहबाज-मुनीर के अरमानों पर फिरा पानी
बांग्लादेश ने पाकिस्तान से मिली आजादी का जश्न मनाते हुए भारत के साथ संबंधों में एक नई शुरुआत की है। तारिक रहमान के नेतृत्व में नई दिल्ली से बढ़ती नजदीकियों ने पाकिस्तान के 'शहबाज-मुनीर' प्लान को पूरी तरह से फेल कर दिया है। जानिए कैसे पलटी पूरी बाजी।

बांग्लादेश ने 26 मार्च को अपना स्वतंत्रता दिवस पूरी भव्यता और ऐतिहासिक गौरव के साथ मनाया। 1971 में पाकिस्तान के दमनकारी शासन से मिली इस आजादी का जश्न इस साल कुछ खास मायने रखता है। दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में पिछले कुछ समय से चल रही उथल-पुथल के बीच, बांग्लादेश ने एक स्पष्ट संदेश दिया है। शेख हसीना के लंबे शासनकाल के अंत और उसके बाद के घटनाक्रमों को पीछे छोड़ते हुए तारिक रहमान के नेतृत्व में बनी नई सरकार ने भारत के साथ अपने रणनीतिक और कूटनीतिक संबंधों को एक नई दिशा दी है। इस बदलते परिदृश्य में सबसे बड़ा झटका पाकिस्तान को लगा है। शेख हसीना के सत्ता से बाहर होने के बाद इस्लामाबाद में जो उम्मीदें जगी थीं, वे अब पूरी तरह से धूमिल हो चुकी हैं।
नई दिल्ली में जश्न: भारत-बांग्लादेश संबंधों का 'रीसेट'
बांग्लादेश के स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में नई दिल्ली में आयोजित भव्य समारोह दोनों देशों के बीच संबंधों की एक नई और मजबूत शुरुआत का प्रतीक बना। इस कार्यक्रम में भारत के विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह और विदेश सचिव विक्रम मिस्री का शामिल होना महज एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं थी। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि नई दिल्ली तारिक रहमान की सरकार के साथ मजबूती से खड़ी है। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि भारत के संबंध केवल अवामी लीग (शेख हसीना की पार्टी) तक ही सीमित हैं। लेकिन इस आयोजन ने साबित कर दिया है कि भारत और बांग्लादेश के रिश्ते किसी एक राजनीतिक दल से ऊपर उठकर, दोनों देशों के साझा हितों और भौगोलिक वास्तविकता पर टिके हैं।
26 मार्च के कार्यक्रम में हाई कमिश्नर रियाज हामिदुल्लाह ने 1971 के मुक्ति संग्राम का जिक्र किया, जहां भारत ने बांग्लादेश की मदद की थी- 1668 भारतीय सैनिक शहीद हुए, पश्चिम बंगाल-त्रिपुरा-पूर्वोत्तर के लोग मदद के लिए आगे आए। उन्होंने साझा सांस्कृतिक विरासत (रवींद्रनाथ, नजरुल, सत्यजीत रे) का भी जिक्र किया।
मोहम्मद यूनुस का कार्यकाल और पाकिस्तान की गलतफहमी
अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना भारत भाग गईं। उनकी अनुपस्थिति में नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस ने अंतरिम सरकार संभाली। इस दौरान बांग्लादेश-पाकिस्तान संबंधों में तेजी से गर्मजोशी देखी गई। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने कई बार मुलाकातें कीं। जनवरी 2025 में बांग्लादेश की उच्चस्तरीय सैन्य प्रतिनिधिमंडल ने इस्लामाबाद जाकर मुनीर से मुलाकात की और 'बाहरी प्रभावों से स्वतंत्र' रक्षा सहयोग पर जोर दिया। सीधा व्यापार बहाल हुआ, उड़ानें शुरू हुईं, वीजा नियम आसान किए गए। यूनुस सरकार ने भारत से दूरी बनाई। इस बीच बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर खुलकर हमले होते रहे। जिससे भारत के साथ सीमा सुरक्षा और व्यापारिक सहयोग पर तनाव बढ़ा। पाकिस्तान को लगा कि हसीना के भारत-समर्थक अध्याय के बाद बांग्लादेश उसके पाले में आ गया है। लेकिन फरवरी 2026 के आम चुनाव ने सब बदल दिया। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने भारी बहुमत हासिल किया। खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान 17 साल के लंदन निर्वासन के बाद वापस लौटे और फरवरी में प्रधानमंत्री बने। BNP की जीत ने यूनुस के अंतरिम दौर को समाप्त कर दिया।
क्यों फेल हुआ 'शहबाज-मुनीर' का प्लान?
पाकिस्तान का यह सोचना कि वह 1971 के घावों को भुलाकर बांग्लादेश को भारत के खिलाफ खड़ा कर लेगा, उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई। बाजी पलटने के मुख्य कारण कई हैं।
1971 का ऐतिहासिक सच: बांग्लादेश की नींव ही पाकिस्तान से मिली आजादी पर रखी गई है। 26 मार्च का जश्न इस बात का सीधा प्रमाण है कि बांग्लादेशी अवाम 1971 के पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों को भूली नहीं है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने 25 मार्च, 1971 की घटना को एक 'पूर्व नियोजित नरसंहार' करार दिया और मुक्ति संग्राम की भावना के अनुरूप 'समानता, मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय' पर आधारित देश और समाज के निर्माण की अपील की। बांग्लादेश के इतिहास में इसे 'सबसे शर्मनाक और क्रूर दिनों में से एक' बताते हुए, रहमान ने 'एक्स' पर एक संदेश में यह भी कहा कि वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को स्वतंत्रता के मूल्य और महत्व को बताने के लिए 25 मार्च के नरसंहार के बारे में जानना आवश्यक है। उन्होंने सीधे तौर पर पाकिस्तान का नाम लिया। पाकिस्तानी सेना ने 25 मार्च, 1971 को पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली लोगों के स्वशासन की मांग को दबाने के लिए 'ऑपरेशन सर्चलाइट' शुरू किया, जिसमें अकेले ढाका में 20,000 से अधिक लोग मारे गए। आधिकारिक तौर पर, इसके बाद नौ महीने तक चले मुक्ति संग्राम में 30 लाख लोग मारे गए। बांग्लादेश पीड़ितों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इस दिन को 'नरसंहार स्मरण दिवस' के रूप में मनाता है।
आर्थिक वास्तविकताएं: तारिक रहमान की नई सरकार को यह अच्छी तरह पता है कि बांग्लादेश के आर्थिक विकास, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार के लिए भारत एक अपरिहार्य साझेदार है। पाकिस्तान, जो खुद गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है, बांग्लादेश को कोई ठोस आर्थिक सहयोग नहीं दे सकता।
भारत की परिपक्व कूटनीति: भारत ने हसीना सरकार के पतन के बाद संयम और परिपक्वता दिखाई। नई दिल्ली ने बिना किसी दखलंदाजी के नई सरकार के साथ रचनात्मक बातचीत शुरू की, जिससे तारिक रहमान प्रशासन का भारत पर भरोसा कायम हुआ।
तारिक रहमान का विजन: संतुलन और विकास
तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश ने 'इंडिया आउट' जैसे लोकलुभावन लेकिन नुकसानदेह नैरेटिव को खारिज कर दिया है। नई सरकार की प्राथमिकता देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना और लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत करना है। इसके लिए एक स्थिर और शांतिपूर्ण पड़ोस सबसे जरूरी है। भारत के साथ व्यापार, कनेक्टिविटी और सुरक्षा के मुद्दों पर नए सिरे से सहमति बन रही है।
पाकिस्तान का वह 'मास्टरप्लान' औंधे मुंह गिर गया है जिसमें वह बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करना चाहता था। तारिक रहमान के नेतृत्व वाले बांग्लादेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसकी विदेश नीति यथार्थवाद, आर्थिक प्रगति और भारत के साथ मजबूत पड़ोसी धर्म पर आधारित होगी।




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