बंगाल में SIR के बाद 61 लाख मतदाताओं के नाम काटे गए, 1.2 करोड़ तक जा सकता है आंकड़ा
चुनाव आयोग के मुताबिक, सबसे अधिक पुरुष मतदाताओं की संख्या 3,60,22,642 है। इसके बाद महिला मतदाताओं की संख्या 3,44,35,260 है। वहीं बंगाल में थर्ड जेंडर वोटर की संख्या 1,382 है।

Bengal SIR Voter List: पश्चिम बंगाल में पिछले चार महीनों से जारी 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) की प्रक्रिया शनिवार को समाप्त हो गई। निर्वाचन आयोग द्वारा जारी अंतिम मतदाता सूची में राज्य के चुनावी परिदृश्य की एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। इस बार मतदाता सूची में 8 प्रतिशत (लगभग 61 लाख) की शुद्ध गिरावट दर्ज की गई है, जबकि अन्य 60 लाख मतदाताओं के नाम जांच के घेरे में हैं। शनिवार शाम मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) मनोज कुमार अग्रवाल द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, बंगाल की नई मतदाता सूची में 7.04 करोड़ मतदाताओं के नाम हैं। अक्टूबर में जब प्रक्रिया शुरू हुई थी, तब मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ थी, जो अब घटकर 7.04 करोड़ रह गई है।
चुनाव आयोग के मुताबिक, सबसे अधिक पुरुष मतदाताओं की संख्या 3,60,22,642 है। इसके बाद महिला मतदाताओं की संख्या 3,44,35,260 है। वहीं बंगाल में थर्ड जेंडर वोटर की संख्या 1,382 है। अब तक 63,66,952 नाम हटाए गए हैं। ये या तो मृत हो गए हैं या फिर कहीं दूसरी जगह पर शिफ्ट हो चुके हैं।
जांच के दायरे में 60 लाख वोटर
इस संशोधन की सबसे बड़ी और विवादास्पद बात यह है कि 60,06,675 मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में तो हैं, लेकिन उनके आगे विचाराधीन का मार्क लगा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त 501 न्यायिक अधिकारी (बंगाल, झारखंड और ओडिशा से) इन नामों की समीक्षा कर रहे हैं। सीईओ अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि जब तक इन अधिकारियों द्वारा नामों को हरी झंडी नहीं दी जाती और सप्लीमेंट्री (पूरक) सूची प्रकाशित नहीं होती, ये 60 लाख लोग आगामी विधानसभा चुनाव में मतदान नहीं कर पाएंगे।
कोलकाता में पत्रकारों से बात करते हुए मनोज कुमार अग्रवाल ने स्वीकार किया कि इस विशाल प्रक्रिया में कुछ त्रुटियां हुई हैं, लेकिन उन्होंने उन्हें नगण्य बताया। उन्होंने कहा, "हमें अनियमितताओं के कुछ निश्चित मामले मिले हैं और हम उन पर कड़ी कार्रवाई करेंगे। फिलहाल, 60 लाख लंबित मामले हमारे अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं और न्यायिक अधिकारी इनकी समीक्षा कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि इनका निपटारा जल्द होगा।"
क्यों अभूतपूर्व है यह संशोधन?
पश्चिम बंगाल का यह चुनाव संशोधन कई मायनों में ऐतिहासिक और विवादित रहा है। माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की तैनाती को लेकर विवाद हुआ। पहली बार चुनाव आयोग ने राज्य सरकार के अधिकारियों (EROs) के काम की निगरानी के लिए हजारों केंद्रीय कर्मचारियों को माइक्रो-ऑब्जर्वर के रूप में तैनात किया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा इस प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जिसके बाद अदालत ने न्यायिक अधिकारियों को पात्रता तय करने का जिम्मा सौंपा।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम
चुनावों की आहट के बीच राज्य में सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी गई है। सीईओ ने बताया कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की 240 कंपनियां पहले ही तैनात की जा चुकी हैं और 240 अन्य कंपनियां 10 मार्च से पहले बंगाल पहुंच जाएंगी। चुनाव की घोषणा होने तक कानून-व्यवस्था राज्य प्रशासन के अधीन रहेगी, जिसके बाद यह पूरी तरह चुनाव आयोग के नियंत्रण में आ जाएगी।




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