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तो अकेले नहीं डूबेगा ईरान! अमेरिकी हमलों के बाद पड़ोसी देशों में खौफ, पाक भी चपेट में

ईरान पर अमेरिका और इजरायल के संभावित हमले से पूरे मध्य पूर्व में दहशत है। खाड़ी देशों को ईरानी पलटवार, भारी शरणार्थी संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से वैश्विक तेल संकट का डर सता रहा है। जानिए पूरी रिपोर्ट।

Sat, 28 Feb 2026 03:16 PMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, तेहरान
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तो अकेले नहीं डूबेगा ईरान! अमेरिकी हमलों के बाद पड़ोसी देशों में खौफ, पाक भी चपेट में

ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने हमले कर दिए हैं। इन भीषण जंग के शुरू होने से ईरान के पड़ोसी देशों में गहरी चिंता है कि इससे पूरा क्षेत्र अस्थिर हो सकता है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के मुख्यालय पेंटागन ने ईरान में चलाए जा रहे अमेरिकी सैन्य अभियानों को 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' नाम दिया।

एक राजनयिक सूत्र ने एएफपी को बताया कि अमेरिकी हमले के बाद ईरान पलटवार करेगा और यह संकट पूरे क्षेत्र में फैल जाएगा। होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किया जा सकता है और ईरान के प्रॉक्सी गुट सक्रिय हो सकते हैं। इसके अलावा, ईरान में अराजकता फैलने से तुर्की और यूरोपीय संघ (EU) भी प्रभावित होंगे, जिससे शरणार्थियों की भारी भीड़ उमड़ने की आशंका है।

ईरानी जवाबी कार्रवाई का डर

खाड़ी देशों में वाशिंगटन के सहयोगियों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि ईरान उनके देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों या उनके अपने महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर जवाबी हमला कर सकता है। चिंताओं की बीच ऐसी खबरें भी हैं कि ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले शुरू भी कर दिए हैं। जून 2025 में, इजरायली हमले से शुरू हुए 12-दिवसीय युद्ध के दौरान अमेरिकी हवाई हमलों के जवाब में, ईरान ने कतर में स्थित अमेरिकी 'अल-उदीद बेस' पर हमला किया था।

इस साल जनवरी में कतर, सऊदी अरब और ओमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन पर दबाव डाला था कि वे ईरान में विरोध प्रदर्शनों पर हुई क्रूर कार्रवाई के जवाब में विचार किए जा रहे हमलों को टाल दें। विशेषज्ञ पियरे राजौक्स के अनुसार, खाड़ी देश जानते हैं कि वे बेहद संवेदनशील स्थिति में हैं। ईरान के पास संयंत्रों, हाइड्रोकार्बन हब और बिजली स्टेशनों जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों को तबाह करने के लिए पर्याप्त मिसाइलें मौजूद हैं।

हिंसा भड़कने और सत्ता परिवर्तन का खतरा

यदि अमेरिका किसी तरह से ईरान की इस्लामी सरकार को गिरा देता है, तो विशेषज्ञों को डर है कि देश भारी हिंसा की चपेट में आ सकता है, जहां अलगाववादी और सशस्त्र गुट सत्ता के लिए आपस में भिड़ेंगे। एक यूरोपीय खुफिया अधिकारी ने चेतावनी दी है कि सत्ता परिवर्तन देश के भीतर से होना चाहिए। बाहरी हस्तक्षेप (अमेरिका या इजरायल द्वारा) से लीबिया जैसी स्थिति पैदा हो सकती है, जो गद्दाफी के पतन के बाद से ही लंबे समय तक हिंसा और राजनीतिक विभाजन का शिकार रहा है।

तुर्की को डर है कि सीमाओं पर अराजकता फैलेगी और कुर्द विद्रोही समूह (PKK से जुड़े) इसका फायदा उठाकर तुर्की के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं। वहीं, पूर्व राजनयिक मलीहा लोधी के अनुसार, सीमा पार से अस्थिरता फैलने पर पाकिस्तान भी गंभीर रूप से प्रभावित होगा। ईरान के कमजोर होने से यमन में हूती और लेबनान में हिजबुल्लाह जैसे ईरान के सहयोगी मध्य पूर्व में अधिक आक्रामक हो सकते हैं।

अगला बड़ा शरणार्थी संकट?

ईरान के कुछ पड़ोसियों को सीरियाई गृहयुद्ध के बाद (2015) जैसे बड़े पैमाने पर शरणार्थी संकट का डर सता रहा है। ईरान के आकार और विशाल जनसंख्या को देखते हुए यह संकट बहुत बड़ा हो सकता है। तुर्की, अजरबैजान और आर्मेनिया इस बात से विशेष रूप से चिंतित हैं कि वे शरणार्थियों का नया ठिकाना बन सकते हैं। रूसी विश्लेषक निकिता स्मागिन के अनुसार, अजरबैजान और आर्मेनिया जैसे छोटे देशों के लिए यह शरणार्थी संकट आसानी से पूरे देश की स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है।

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तेल और आर्थिक संकट

होर्मुज जलडमरूमध्य की घेराबंदी: तेल उत्पादक खाड़ी देशों को डर है कि हमलों के परिणामस्वरूप होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी हो सकती है। दुनिया की 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश वर्तमान में अपनी अर्थव्यवस्था में विविधता लाने के लिए भारी निवेश कर रहे हैं। शोधकर्ता सिंजिया बियान्को के अनुसार, तेल आपूर्ति बाधित होने से उनके सामने एक बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो जाएगा।

यदि खाड़ी से तेल की आपूर्ति घटती है, तो दुनिया का सबसे बड़ा आयातक देश चीन अपनी जरूरतें कहीं और से पूरी कर सकता है। यह खाड़ी के उन राजतंत्रों के लिए एक बड़ा झटका होगा, जो अमेरिका पर अपनी व्यापारिक निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं।

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