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इन पत्तों में रखकर कभी कृष्ण खाते थे माखन, MP के कृष्ण बरगद पेड़ की कहानी

कान्हा' ने जिस 'पेड़' के पत्तों में रखकर माखन खाया था, उसकी हर डाल पर आज भी 'कटोरी-चम्मच' जैसे आकार में पत्ते उगते हैं। दुर्लभ, दिव्य और अलौकिक माना जाने वाले इस कृष्ण बरगद का पेड़ रीवा के वन विभाग के उद्यानिकी में मौजूद है।

Wed, 24 Sep 2025 01:08 PMUtkarsh Gaharwar लाइव हिन्दुस्तान, रीवा
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इन पत्तों में रखकर कभी कृष्ण खाते थे माखन, MP के कृष्ण बरगद पेड़ की कहानी

रीवा के उद्यानिकी में एक पेड़ है कृष्ण बरगद, जिसे संरक्षित करने का काम वन विभाग द्वारा किया जा रहा है। हालांकि यह पेड़ अभी छोटा है, पर इस इस पेड़ की खासियत इसकी पत्तियां हैं, इसके बड़े पत्ते कटोरी के जैसे होते हैं और छोटे पत्ते चम्मच की तरह होते हैं। कहा जाता हैं कि भगवान कृष्ण पड़ोस के घरों से माखन चुराया करते थे, और मां यशोदा की डांट से बचने के लिए भगवान चुराया हुआ माखन इस पेड़ के पत्तों की कटोरी बनाकर वहीं छिपा देते थे। मान्यता है कि तभी से इस पेड़ की पत्तियों का आकार कटोरी जैसा हो गया।

कान्हा' ने जिस 'पेड़' के पत्तों में रखकर माखन खाया था, उसकी हर डाल पर आज भी 'कटोरी-चम्मच' जैसे आकार में पत्ते उगते हैं। दुर्लभ, दिव्य और अलौकिक माना जाने वाले इस कृष्ण बरगद का पेड़ रीवा के वन विभाग के उद्यानिकी में मौजूद है। हालांकि यह पेड़ अभी छोटा है लेकिन इस संरक्षित करने का काम किया जा रहा है, जिसके बाद इन्हें दूसरे जगहों पर भी भेजा जाएगा।मान्यता है कि मैया यशोदा ने कन्हैया को पहली बार इसी वटवृक्ष के पत्तों में रखकर माखन खिलाया था। दूसरी मान्यता है कि भगवान कृष्ण पड़ोस के घरों से माखन चुराया करते थे, और मां यशोदा की डांट से बचने के लिए भगवान चुराया हुआ माखन इस पेड़ के पत्तों की कटोरी बनाकर वहीं छिपा देते थे।

ईश्वर का सानिध्य और स्पर्श पाकर यह अलौकिक और दिव्य बन गया था। कहते हैं कन्हैया को मक्खन खिलाने के लिए इसका हर पत्ता कटोरी और चम्मच जैसे आकार में उगने लगा था। आज भी इस कृष्ण बरगद के पत्ते कटोरीनुमा आकार में होते हैं। आयुर्वेद में कृष्ण बरगद का उपयोग कई शारीरिक समस्याओं के इलाज के लिए किया जाता है। जैसे पाचन सुधारना, खून साफ करना, सर्दी-जुकाम से राहत, सूजन कम करना, और घावों का इलाज। इसके पत्तों के दूध का उपयोग दर्द निवारक के तौर पर, इसकी छाल और पत्तों का उपयोग जलन और त्वचा रोगों के लिए होता है। यह एक विलुप्त प्रजाति का पौधा जो बहुत ही कम देखने को मिलता है, विलुप्त प्रजाति का होने के चलते अब इसके पौधे मिल नहीं पाते जिससे आयुर्वेद के इलाज में इसका उपयोग नहीं हो पा रहा है।

रीवा से सादाब सिद्दीकी

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