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निष्पक्ष सुनवाई की कीमत पर मामले का शीघ्र निपटारा नहीं कर सकते, HC ने कहा- यह न्याय का दफन है

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि निष्पक्ष सुनवाई की कीमत पर किसी मामले का शीघ्र निपटारा नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि न्याय में देरी न्याय से इनकार के समान है, लेकिन जल्दबाजी में किया गया न्याय न्याय का दफन है।

Wed, 18 Feb 2026 05:34 PMSubodh Kumar Mishra लाइव हिन्दुस्तान, जबलपुर
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निष्पक्ष सुनवाई की कीमत पर मामले का शीघ्र निपटारा नहीं कर सकते, HC ने कहा- यह न्याय का दफन है

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि निष्पक्ष सुनवाई की कीमत पर किसी मामले का शीघ्र निपटारा नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि न्याय में देरी न्याय से इनकार के समान है, लेकिन जल्दबाजी में किया गया न्याय न्याय का दफन है। ट्रायल कोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी की। मामला पोक्सो एक्ट से जुड़ा था।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी को आवेदन दाखिल करने में देरी या पुराने मामलों के लंबित होने के आधार पर फोरेंसिक विशेषज्ञों को बुलाने और उनकी जांच करने के अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि मामलों का शीघ्र निपटान निष्पक्ष सुनवाई की कीमत पर नहीं हो सकता है।

विशेष न्यायाधीश के आदेशों को चुनौती

जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह ने आरोपी द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार कर लिया, जिसमें रीवा के विशेष न्यायाधीश (पोक्सो) के आदेशों को चुनौती दी गई थी। विशेष न्यायाधीश ने फोरेंसिक विशेषज्ञ को बुलाकर जांच करने की मांग करने वाले बचाव पक्ष के आवेदनों को खारिज कर दिया था। इसके बजाय उन्होंने मामले को अंतिम बहस के लिए निर्धारित कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने इस आधार पर अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था कि मामला सबसे पुराने 100 मामलों की श्रेणी में आता है, जिनमें शीघ्र निपटान की जरूरत होती है। कोर्ट ने कहा कि सरकारी फोरेंसिक विशेषज्ञ की रिपोर्ट औपचारिक प्रमाण के बिना स्वीकार्य है।

तकनीकी आधार पर अस्वीकार नहीं कर सकते

ट्रायल कोर्ट के इस फैसले पर असहमति जताते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि धारा 293 विशेषज्ञ रिपोर्टों को साक्ष्य के रूप में उपयोग करने की अनुमति देती है, फिर भी न्यायालय के पास विशेषज्ञ को तलब करने और उससे पूछताछ करने का विवेकाधिकार सुरक्षित है। विशेषकर तब जब बचाव पक्ष रिपोर्ट पर आपत्ति जताता है। न्यायालय ने कहा कि एक बार जब आरोपी डीएनए या फोरेंसिक साक्ष्य पर आपत्ति जताता है और विशेषज्ञ से जिरह करना चाहता है तो ऐसे अनुरोध को तकनीकी आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

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उचित अवसर दिया जाना चाहिए

राहुल बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि केवल एक वैज्ञानिक रिपोर्ट को प्रदर्शित करने से उसकी सामग्री साबित नहीं होती है। ऐसे साक्ष्यों का परीक्षण करने के लिए उचित अवसर दिया जाना चाहिए।

जल्दबाजी में किया गया न्याय न्याय का दफन है

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय ने टिप्पणी की कि जब आरोपी डीएनए रिपोर्ट पर आपत्ति जताता है और विशेषज्ञ गवाह से पूछताछ करना चाहता है तो आवेदन को तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि त्वरित निपटान का अर्थ यह नहीं है कि मुकदमे को जल्दबाजी में चलाया जाए। न्याय में देरी न्याय से इनकार के समान है, लेकिन जल्दबाजी में किया गया न्याय न्याय का दफन है।

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विवादित आदेशों को रद्द कर दिया

यह मानते हुए कि अवसर से वंचित करना बचाव पक्ष के लिए प्रतिकूल होगा और मुकदमे की निष्पक्षता को प्रभावित करेगा, न्यायालय ने विवादित आदेशों को रद्द कर दिया। साथ ही ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह विशेषज्ञ और अन्य गवाहों को तलब करे और आगे की कार्यवाही से पहले उनके बयान दर्ज करे।

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