Temple Of India: काशी में बने अनोखे मंदिर का इतिहास! पीसा की मीनार से होती है तुलना
Varanasi Tilted Temple History: काशी में एक ऐसा मंदिर है जिसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। आध्यात्मिक सैर के लिए आने वाले लोग ही केवल इस मंदिर में बारे में जानते हैं। एक तरफ से झुके इस मंदिर की तुलना इटली के पीसा की मीनार से होती है और इसे शापित भी माना जाता है।

काशी के कण-कण में भगवान भोलेनाथ बसे हैं। ये शहर अपनी आध्यात्मिक शांति और सुकून के लिए जाना जाता है और देश ही नहीं विदेश से भी लोग यहां खिंचे चले आते हैं। वाराणसी में केवल काशी विश्वनाथ का मंदिर और गंगा के घाट ही नहीं हैं बल्कि यहां पर कुछ ऐसे अनोखे मंदिर हैं, जिनका इतिहास कई सौ साल पुराना है। ये मंदिर अपनी खास बनावट की वजह से फेमस हैं। इन्हीं मंदिरों में से एक है 'काशी का झुका हुआ मंदिर', जिसे 'काशी करवट'के नाम से लोग जानते हैं। ये मंदिर भी भगवान भोलेनाथ को समर्पित है और इसका नाम है रत्नेश्वर महादेव टेंपल।
रत्नेश्वर महादेव मंदिर 9 डिग्री पर झुका है
इटली में बनी पीसा की मीनार करीब 4 डिग्री पर झुकी है और वर्ल्ड फेमस है। लेकिन रिपोर्ट्स की माने तो रत्नेश्वर महादेव टेंपल जो भगवान महादेव को समर्पित ये करीब 9 डिग्री पर झुका हुआ है। साथ ही इसकी ऊंचाई भी पीसा की मीनार से 20 मीटर ज्यादा है। इस मंदिर को कई नामों से जाना जाता है। मातृऋण महादेव मंदिर, वाराणसी का झुका मंदिर और काशी करवात नाम से लोग इसे जानते हैं।
गंगा में डूबा रहता है मंदिर
काशी का ये मंदिर मणिकर्णिका घाट और सिंधिया घाट के बीच में बना है और साल के ज्यादातर समय गंगा नदी में डूबा रहता है। मंदिर की बनावट ऐसी है कि नदी का पानी इसके शिखर को भी डुबो सकता है।
मंदिर का इतिहास
मंदिर के इतिहास को लेकर केवल लोक मान्यताएं ही प्रचलित हैं क्योंकि लिखित में इस मंदिर का उल्लेख कहीं नहीं मिलता। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 19वीं शताब्दी में हुआ था।
मंदिर के झुके होने के पीछे है लोकमान्यताएं
मंदिर के झुके होने के पीछे कई लोक कहानियां प्रचलित हैं। जिनमे से एक सबसे ज्यादा सुनी जाती है। कहा जाता है कि ये मंदिर राजा मानसिंह के एक सेवक ने अपनी मां रत्ना बाई के लिए बनवाया था। मंदिर बनने के बाद उसने घमंड के साथ घोषणा की कि उसने अपनी मां का कर्ज चुका दिया है। इन शब्दों के निकलते ही मान्यता है कि मंदिर एक तरफ झुकने लगा, ये दिखाने के लिए कि मां का कर्ज कभी नहीं चुकाया जा सकता। वहीं एक कहानी प्रचलित है कि रानी अहिल्याबाई होल्कर काशी में मंदिर और कुंडों का निर्माण करा रही थीं। उसी समय उनकी दासी रत्नाबाई ने भी मणिकर्णिका कुंड के पास शिव मंदिर बनवाने की इच्छा जताई। मंदिर बनाने के लिए रानी से उसने रुपये भी काफी उधार लिए और इसे बनवाया। अहिल्याबाई इसका वैभव देखकर अत्यंत प्रसन्न हुईं, लेकिन उन्होंने दासी से कहा कि वह अपना नाम इस मंदिर को न दें। दासी ने बाद में अपने नाम पर ही इस मंदिर का नाम रत्नेश्वर महादेव करवा दिया। इस पर अहिल्याबाई ने नाराज होकर श्राप दिया कि मंदिर में बहुत कम ही दर्शन-पूजन होगा।
आज भी नहीं होती पूजा-अर्चना
इस मंदिर का गर्भगृह साल के छह महीने पानी में ही रहता है। मानसून के महीनों में तो शिखर तक पानी रहता है। इस मंदिर में मानसून के महीनों में किसी तरह की पूजा-अर्चना नहीं होती। कुछ लोगों की मान्यता है कि ये मंदिर शापित है और यहां पूजा-अर्चना करने से उनके में घर में विपदा आ सकती है।
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