क्यों टूट जाते हैं आपके न्यू ईयर रिजॉल्यूशन ? डॉ. चांदनी ने दिया जवाब
इस सवाल का जवाब लेने के लिए हमने बात की गेटवे ऑफ हीलिंग की संस्थापक और मनोचिकित्सक, डॉ. चांदनी तुगनाइट से, जिन्होंने बताया कि नए साल पर लिए गए रिजॉल्यूशन कुछ समय बाद व्यक्ति को बेचैन क्यों करने लगते हैं।

हर साल 1 जनवरी को हम एक नई शुरुआत का वादा खुद से करते हैं। मन में जोश होता है, उम्मीद होती है और एक लंबी लिस्ट होती है कि इस साल सब कुछ बदल देंगे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि कुछ ही दिनों या हफ्तों में यही रिजॉल्यूशन थकान, बेचैनी और एंग्जायटी का कारण बनने लगते हैं। सवाल यह नहीं है कि हम रिजॉल्यूशन क्यों बनाते हैं, सवाल यह है कि वे हमें सपोर्ट करने की जगह तनाव क्यों देने लगते हैं। अपने इस सवाल का जवाब लेने के लिए हमने बात की गेटवे ऑफ हीलिंग की संस्थापक और मनोचिकित्सक, डॉ. चांदनी तुगनाइट से, जिन्होंने बताया कि नए साल पर लिए गए रिजॉल्यूशन कुछ समय बाद व्यक्ति को बेचैन क्यों करने लगते हैं।
5 कारण, जो रिजॉल्यूशन को तनाव में बदल देते हैं
जब बदलाव उत्साह नहीं, बोझ बन जाए- अक्सर रिजॉल्यूशन एक तरह का मानसिक बोझ लेकर आते हैं। हम तय कर लेते हैं कि अब कोई ढील नहीं चलेगी। हर दिन बेहतर बनना है, हर आदत सुधारनी है। लेकिन इंसान मशीन नहीं है। जब हम खुद को बिना रुके बदलने की कोशिश करते हैं, तो दिमाग उसे खतरे की तरह लेने लगता है। नतीजा बेचैनी और तनाव होता है।
रिजॉल्यूशन और कंट्रोल करने की सोच- बहुत से रिजॉल्यूशन कंट्रोल से जुड़े होते हैं। वजन कंट्रोल करना, खर्च कंट्रोल करना, भावनाएं कंट्रोल करना। कंट्रोल की यह जिद दिमाग को लगातार चौकन्ना रखती है। दिमाग आराम तभी करता है जब उसे लचीलापन मिले। जब हर दिन खुद पर निगरानी रखनी पड़े, तो मोटिवेशन धीरे-धीरे एंग्जायटी में बदल जाता है।
एक तारीख से सब बदलने का भ्रम- हम यह मान लेते हैं कि साल बदलते ही हमारी आदतें, सोच और भावनाएं भी बदल जाएंगी। लेकिन असल जिंदगी में बदलाव एक तारीख से नहीं, प्रक्रिया से आता है। जब बदलाव तुरंत नहीं दिखता, तो निराशा पैदा होती है। यही निराशा दिमाग में सवाल खड़े करती है कि शायद हम में ही कुछ कमी है।
रिजॉल्यूशन और सेल्फ-क्रिटिसिज्म- कई बार रिजॉल्यूशन उम्मीद से नहीं, खुद से नाराजगी से निकलते हैं। हमें लगता है कि हम पर्याप्त अच्छे नहीं हैं। इसलिए खुद को सुधारना जरूरी है। यह सोच हमें आगे बढ़ाने की जगह भीतर से दबाने लगती है। जब बदलाव सेल्फ-क्रिटिसिज्म से आता है, तो वह लंबे समय तक टिक नहीं पाता।
तुलना का अनदेखा दबाव- नया साल आते ही चारों तरफ लोग अपने लक्ष्य, प्लान और सपने शेयर करने लगते हैं। कोई फिटनेस का रिजॉल्यूशन दिखाता है, कोई करियर का। हम चाहे न चाहें, तुलना शुरू हो जाती है। यह तुलना हमें यह महसूस कराती है कि हम पीछे हैं। यही भावना एंग्जायटी को चुपचाप बढ़ाती रहती है।
क्या है एक्सपर्ट का सुझाव?
इस साल रिजॉल्यूशन लेने से पहले खुद से कुछ सवाल पूछना शुरू करें जैसे इस साल मुझे किस चीज से राहत चाहिए। किस आदत से मुझे सहारा मिलेगा। छोटे कदम, खुले विकल्प और खुद के प्रति नरमी एंग्जायटी को कम करती है। बदलाव तब आसान होता है जब वह डर से नहीं, समझ से आए। नया साल खुद को सुधारने का अल्टीमेट टेस्ट नहीं है। यह खुद से जुड़ने का एक मौका है। जब हम रिजॉल्यूशन को कठोर नियमों की तरह नहीं, बल्कि दिशा की तरह देखते हैं, तब वे हमें डराते नहीं हैं। तब नया साल दबाव नहीं, संभावना लेकर आता है।
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