नानी का घर vs दादी का घर : जानिए क्यों ज्यादातर बच्चे ननिहाल की ओर होते हैं आकर्षित nani ka ghar vs dadi ka ghar know why most of the kid lean towards the maternal side here is what psychotherapist answer, रिलेशनशिप टिप्स - Hindustan
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नानी का घर vs दादी का घर : जानिए क्यों ज्यादातर बच्चे ननिहाल की ओर होते हैं आकर्षित

सवाल यह नहीं है कि दादी का घर कम प्यार देता है, बल्कि यह है कि नानी का घर ज्यादातर बच्चों को ज्यादा सहज और अपना क्यों लगता है। इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने बात की गेटवे ऑफ हीलिंग की संस्थापक और फेमस मनोचिकित्सक डॉ. चांदनी तुगनाइट से।

Fri, 30 Jan 2026 12:22 AMManju Mamgain लाइव हिन्दुस्तान
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नानी का घर vs दादी का घर : जानिए क्यों ज्यादातर बच्चे ननिहाल की ओर होते हैं आकर्षित

बचपन की यादों में अगर सबसे सुरक्षित, सबसे प्यारी और सबसे अपनापन देने वाली जगह याद आती है, तो बहुत से लोग बिना सोचे कहते हैं, नानी का घर। यह बात अक्सर मजाक में कही जाती है, लेकिन इसके पीछे एक गहरा इमोशनल सच छिपा होता है। सवाल यह नहीं है कि दादी का घर कम प्यार देता है, बल्कि यह है कि नानी का घर ज्यादातर बच्चों को ज्यादा सहज और अपना क्यों लगता है। इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने बात की गेटवे ऑफ हीलिंग की संस्थापक और फेमस मनोचिकित्सक डॉ. चांदनी तुगनाइट से।

मां की इमोशंस वहां पहले से मौजूद होते हैं

नानी का घर अक्सर मां के भावनात्मक माहौल का विस्तार होता है। जिस तरह मां बच्चों से बात करती है, उनकी जरूरतें समझती है, वही भाषा नानी के घर में भी मिलती है। वहां बच्चे को ज्यादा समझाने की जरूरत नहीं पड़ती। रोना, शिकायत करना, थक जाना, सब कुछ स्वीकार्य होता है। यह भावनात्मक निरंतरता बच्चे को सुरक्षा का एहसास देती है।

नानी के घर नियम कम, अपनापन ज्यादा लगता है

ज्यादातर बच्चों को नानी का घर इसलिए भी पसंद आता है क्योंकि वहां नियम थोड़े ढीले होते हैं। कब सोना है, कितना खाना है, क्या पहनना है, इन बातों पर सख्ती कम होती है। नानी के घर बच्चा ‘अच्छा बच्चा’ बनने की कोशिश नहीं करता, वह बस बच्चा होता है। इस आजादी में एक गहरी राहत छुपी होती है।

दादी का घर जिम्मेदारी से जुड़ा होता है

दादी का घर अक्सर अनुशासन, परंपरा और सही-गलत से जुड़ा होता है। वहां बच्चा परिवार के ढांचे का हिस्सा बनता है, जहां उसे भूमिका निभानी होती है। यह गलत नहीं है, लेकिन भावनात्मक रूप से यह थोड़ा भारी हो सकता है। कई बच्चों को वहां यह महसूस होता है कि उन्हें समझने से पहले सुधारा जा रहा है।

मां वहां बेटी होती है, बहू नहीं

नानी के घर मां अपनी असली भूमिका में होती है। वहां वह बेटी होती है, न कि बहू। इसका सीधा असर बच्चों पर पड़ता है। जब मां खुद रिलैक्स्ड होती है, तो बच्चे भी सुरक्षित महसूस करते हैं। दादी के घर मां अक्सर जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं के बीच बंटी होती है, और बच्चे इस तनाव को भले शब्दों में न समझें, लेकिन महसूस जरूर करते हैं।

दादी का घर कम प्यार नहीं, अलग तरह का प्यार देता है

यह समझना जरूरी है कि दादी का घर प्यार नहीं देता, ऐसा कहना गलत होगा। वहां प्यार ज्यादा जिम्मेदारी और संरचना के साथ आता है। वह प्यार सिखाता है, गढ़ता है, मजबूत बनाता है। लेकिन हर इंसान को हर समय मजबूत बनने की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी उसे बस सुरक्षित महसूस करने की जरूरत होती है।

कौन सा घर ज्यादा बेहतर

नानी का घर और दादी का घर, दोनों की अपनी-अपनी जगह है। एक जगह आपको आराम देती है, दूसरी आपको आकार देती है। ज्यादातर लोग नानी के घर की तरफ इसलिए झुकते हैं क्योंकि वहां उन्हें बिना शर्त अपनापन मिलता है। और शायद यही वजह है कि बड़े होने के बाद भी, जब दिल थक जाता है, तो याद सबसे पहले नानी के घर की ही आती है।

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