इंडियन या वेस्टर्न, अच्छी सेहत के लिए कौन सी टॉयलेट यूज करना सही?
भारतीय शौचालयों में उकड़ू बैठने की मुद्रा पाचन क्रिया को बेहतर बनाती है तो वहीं वेस्टर्न टॉयलेट का समर्थन करने वाले लोग मानते हैं कि खासकर बुज़ुर्गों के लिए इस तरह का टॉयलेट यूज करना ज्यादा व्यावहारिक और आरामदायक रहता है।

तो अपनी सेहत को अच्छा बनाए रखने के लिए व्यक्ति अपनी डाइट से लेकर फिटनेस तक का बेहद ख्याल रखता है। अपने घर में हर उस चीज को जगह देता है, जो उसके आराम और सेहत का खास ध्यान रखती हो। लेकिन जब कभी बात सेहत की होती है तो ज्यादातर लोग सिर्फ डाइट, फिटनेस और वर्कआउट तक ही सीमित रह जाते हैं। लेकिन आज बात यहां इन सब चीजों की नहीं बल्कि अच्छी सेहत के लिए इंडियन और वेस्टर्न टॉयलेट की होने वाले हैं। यह सवाल अकसर चर्चा का विषय रहा है, कि सेहत को अच्छा बनाए रखने के लिए आखिर कौन सा टॉयलेट यूज करना सही रहता है। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय शौचालयों में उकड़ू बैठने की मुद्रा पाचन क्रिया को बेहतर बनाती है तो वहीं वेस्टर्न टॉयलेट का समर्थन करने वाले लोग मानते हैं कि खासकर बुज़ुर्गों के लिए इस तरह का टॉयलेट यूज करना ज्यादा व्यावहारिक और आरामदायक रहता है। आइए जानते हैं दोनों ही टॉयलेट के बीच के अंतर और फायदे-नुकसान के बारे में।
इंडियन और वेस्टर्न टॉयलेट के बीच में फर्क
बैठने की मुद्रा और पाचन
भारतीय शौचालयों को यूज करते समय उकड़ू होकर बैठना पड़ता है, जिससे आंतें प्राकृतिक रूप से एक सीध में आ जाती हैं और मल त्याग आसानी से होता है। यह कोलन को खाली करने में मदद करता है। इस टॉयलेट को यूज करने से कब्ज और बवासीर का खतरा कम होता है। दूसरी तरफ, पश्चिमी शौचालयों में आपको सीधा बैठना पड़ता है, जिससे मल त्याग में पूरी तरह से मदद नहीं मिल पाती।
आराम और सुविधा
भारतीय शौचालय में उकड़ूं होकर बैठना बुज़ुर्गों, घुटनों के दर्द से पीड़ित लोगों या शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के लिए मुश्किल हो सकता है। जबकि पश्चिमी शौचालयों का इस्तेमाल करना खासकर बच्चों, बुज़ुर्गों और बीमारी से उबर रहे लोगों के लिए ज्यादा आसान होता है।
स्वच्छता और सफाई
भारतीय शौचालयों में आमतौर पर सीट का त्वचा से सीधा संपर्क नहीं होता, जिससे संक्रमण का खतरा भी कम बना होता है। हालांकि, इन्हें साफ करने के लिए ज्यादा पानी और मेहनत की जरूरत पड़ सकती है। वहीं पश्चिमी शौचालय आरामदायक तो होते हैं, लेकिन स्वच्छता बनाए रखने के लिए सीट की नियमित सफाई जरूरी होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि पश्चिमी शौचालय में गुदा का शौच की सतह के साथ संपर्क अधिक होता है, जिससे बैक्टीरिया फैलने का खतरा बना रहता है।
स्वास्थ्य जोखिम
भारतीय शौचालयों में बहुत देर तक उकड़ू पॉजिशन में बैठने से घुटनों और टखनों पर दबाव पड़ सकता है। दूसरी ओर, पश्चिमी शौचालयों में बहुत देर तक बैठने से बवासीर या श्रोणि दबाव की संभावना बढ़ सकती है।
जगह और जीवनशैली के अनुकूल
भारतीय शौचालय कम जगह घेरते हैं और इन्हें लगाना किफायती होता है, इसलिए आज भी ग्रामीण इलाकों में इन्हें ही पसंद किया जाता है। जबकि पश्चिमी शौचालयों में ज्यादा जगह की जरूरत होती है और ये महंगे भी होते हैं। शहरों में सुविधा और आधुनिक जीवनशैली की जरूरतों की वजह से इन्हें ज्यादा पसंद किया जाता है।
इंडियन या वेस्टर्न, कौन सा टॉयलेट बेहतर?
भारतीय शौचालय (स्क्वाटिंग टॉयलेट) और पश्चिमी शौचालय (सीटिंग टॉयलेट) दोनों के अपने फायदे और नुकसान हैं। यह तय करना कि स्वास्थ्य के लिए कौन सा बेहतर है, आपकी शारीरिक स्थिति, उम्र, और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं पर निर्भर करता है। भारतीय शौचालय पाचन और मल त्याग को बढ़ावा देते हैं, जबकि पश्चिमी शौचालय अधिक आराम और सुगमता प्रदान करते हैं। तो ऐसे में यदि आप युवा और स्वस्थ हैं, तो भारतीय शौचालय बेहतर स्वास्थ्य लाभ प्रदान कर सकते हैं। लेकिन अगर आराम और सुगमता आपकी प्राथमिकता है, तो पश्चिमी शौचालय एक बेहतर विकल्प हैं।
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