Kharsawan firing incident: the story of the Jallianwala Bagh massacre in independent India जब हजारों आदिवासियों पर मिलिट्री ने बरसाईं गोलियां, आजाद भारत का ‘जलियावाला बाग कांड’, Jharkhand Hindi News - Hindustan
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जब हजारों आदिवासियों पर मिलिट्री ने बरसाईं गोलियां, आजाद भारत का ‘जलियावाला बाग कांड’

ये घटना 1 जनवरी 1948 को घटी थी, जिसे आजाद भारत का 'जलियावाला बाग कांड' का नाम दिया गया। वजह, ओडिशा मिलिट्री द्वारा पचास हजार से अधिक आदिवासियों पर अंधाधुंध फायरिंग करवाना था। इस नरसंहार में 2000 से ज्यादा आदिवासी मारे गए, लेकिन सरकारी आंकड़ों में इस संख्या को 35 बताया गया।

Wed, 17 Sep 2025 06:40 PMRatan Gupta लाइव हिन्दुस्तान, रांची
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जब हजारों आदिवासियों पर मिलिट्री ने बरसाईं गोलियां, आजाद भारत का ‘जलियावाला बाग कांड’

15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य बना, लेकिन इसके बनने के पहले कई आदिवासियों ने अपनी जान गंवाई। जान गंवाने की ऐसी ही एक भयावह घटना 1 जनवरी 1948 को घटी थी, जिसे आजाद भारत का 'जलियावाला बाग कांड' का नाम दिया गया। वजह, ओडिशा मिलिट्री द्वारा पचास हजार से अधिक आदिवासियों पर अंधाधुंध फायरिंग करवाना था। इस नरसंहार में 2000 से ज्यादा आदिवासी मारे गए, लेकिन सरकारी आंकड़ों में इस संख्या को 35 बताया गया। 'झारखंड गाथा' की पहली कड़ी में जानिए आजाद भारत के 'जलियांवाला बाग कांड' की कहानी।

आखिर क्यों जुटी थी आदिवासी भीड़?

देश आजाद हो चुका था। एक तरफ लोग आजादी का जश्न मना रहे थे, तो वहीं दूसरी तरफ झारखंड के खरसावां में आदिवासी अपनी मांगों के लिए जुटे थे। यहां लगभग पचास हजार से ज्यादा आदिवासी जुटे थे। इसके पीछे की वजह थी, खरसावां (वर्तमान स्थिति झारखंड में है) के ओड़िशा राज्य में विलय का विरोध करना। यहां के आदिवासी समेत तमाम अन्य लोग चाहते थे कि इस रियासत को झारखंड (तब का बिहार) में ही रहने दें।

दूर-दूर से आए थे बच्चे, बूढे और महिलाएं

मशहूर नेता जयपाल सिंह मुंडा पूरे राज्य में आदिवासियों के सबसे मजबूत नेता थे। खरसावां में मौजूद भीड़ उन्हें देखने-सुनने के लिए भी आई हुई थी। कहा जाता है कि वहां जमशेदपुर, रांची, सिमडेगा, खूंटी, तमाडड, चाईबासा और दूरदराज के आदिवासी अपने-अपने पारंपरिक हथियारों के साथ आए हुए थे। वहां हाट जैसी स्थिति थी। आंदोलनकारियों में बड़े-बूढ़े, महिलाएं और बच्चे तक शामिल थे। ये लोग खाने-पीने का सामना तक लेकर पहुंचे थे।

जब मिलिट्री ने बरसाईं अंधाधुंध गोलियां

लेकिन, ओड़िशा सरकार चौकस थी। वह किसी भी हालत में इस सभा को नहीं होने देना चाहती थी। ओड़िशा मिलिट्री के जवान पूरे खरसावां में तैनात कर दिए गए। इलाके को छावनी में बदल दिया गया। इस बीच सूचना मिली की जयपाल सिंह नहीं आ रहे हैं। अपने नेता की गैरमौजूदगी में भीड़ का धैर्य जवाब देने लगा। भीड़ को काबू में करने वाला कोई नहीं था। इधर मिलिट्री ने आदिवासियों के ऊपर अंधाधुंध फायरिंग करनी शुरू कर दी।

कुएं और जंगल में फेंकी लाशें, कुछ जला दी गईं

वरिष्ठ पत्रकार अनुज कुमार सिन्हा अपनी किताब 'झारखंड आंदोलन का संघर्ष- शोषण, संघर्ष और शहादत' में लिखते हैं- "आदिवासियों के पास पारंपरिक हथियार थे, लेकिन इसका इस्तेमाल नहीं कर पाए। देखते ही देखते वहां लाशों का ढेर जमा होने लगा। कुछ लोग जमीन पर लेट गए। कोई पेड़ की आड़ में छिप गया। कोई वहां से भागने में कामयाब हुआ। फायरिंग रुकने के बाद पुलिस के जवानों ने कुएं में लाशें फेंकना शुरू कर दिया। जब कुआं भर गया, तो ट्रकों में भरकर जंगल में फेंक दिया गया। मृतकों की संख्या का सही-सही पता न लगे, इसलिए लाशों को जमीन में भी गाड़ दिया गया और कुछ को जला दिया गया।"

सरकार बोली 35 लोग मरे, लेकिन असलियत कुछ और…

मृतकों की संख्या का सही-सही पता नहीं चल सका। पूर्व सांसद और महाराजा पीके देव की किताब- 'मेमायर ऑफ ए बाइगोन एरा' में इस घटना में मृतकों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कई गुना ज्यादा बताई गई है। इसमें लिखा है- खरसावां का ओड़िशा में विलय करने वाले आदिवासियों पर ओड़िशा मिलिट्री ने फायरिंग की थी, जिसमें 2000 से ज्यादा लोग मारे गए थे। पत्रकार अनुज कुमार भी इस बात को लिखते हैं कि पीके देव की किताब और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान में काफी समानता है। हालांकि ओड़िशा की तत्कालीन सरकार ने पुलिस फायरिंग में केवल 35 आदिवासियों के मारे जाने की पुष्टि की थी।