विक्रम शर्मा हत्याकांड: हत्या में 7.65 बोर से क्लोज रेंज और कंट्रोल्ड शॉट्स का इस्तेमाल
विक्रम शर्मा हत्याकांड की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला है कि हत्या क्लोज रेंज एग्जीक्यूशन थी, जिसमें तीन गोलियां लगी थीं। शूटर ने सिर से सटाकर गोली मारी, जो जानलेवा साबित हुई। 7.65 बोर पिस्टल के इस्तेमाल के संकेत मिले हैं। पुलिस तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर जांच कर रही है।

विक्रम शर्मा हत्याकांड की पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने वारदात के तरीके को लेकर कई अहम संकेत दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, शरीर में तीन गोलियां लगी थीं और फायरिंग बेहद नजदीक से की गई थी। अपराध जगत में इसे क्लोज रेंज एग्जीक्यूशन माना जा रहा है, जहां शूटर और टारगेट के बीच दूरी न्यूनतम रखी जाती है, ताकि निशाना चूकने की गुंजाइश न रहे। चिकित्सकीय सूत्रों के अनुसार, एक गोली सिर से सटाकर मारी गई थी, जो सीधे जानलेवा साबित हुई। अन्य दो गोलियां शरीर के आगे और पीछे की दिशा से आर-पार हुईं। इससे स्पष्ट होता है कि शूटर ने टारगेट को कन्फर्म करने के बाद फायरिंग की और मौके पर किसी तरह की हड़बड़ी नहीं दिखाई।
जांच से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि गोली चलाने की दूरी बेहद कम थी। सिर से सटाकर गोली मारना इस बात का संकेत है कि शूटर टारगेट के बिल्कुल निकट पहुंच चुका था। अपराध की भाषा में इसे प्वाइंट ब्लैंक रेंज कहा जाता है। ऐसे मामलों में शूटर आमतौर पर एक या दो सेकेंड के भीतर फायर कर निकल जाता है। तीनों शॉट्स कंट्रोल्ड और टारगेटेड माने जा रहे हैं। 7.65 बोर पिस्टल के इस्तेमाल के संकेत घटनास्थल से मिले खोखे और पिलेट की जांच में 7.65 बोर पिस्टल के इस्तेमाल की बात सामने आई है। प्रारंभिक विश्लेषण से संकेत है कि हथियार संभवतः विदेशी निर्मित हो सकता है। फोरेंसिक रिपोर्ट के बाद ही इसकी अंतिम पुष्टि होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि 7.65 बोर पिस्टल कॉम्पैक्ट होने के कारण नजदीकी रेंज में बेहद प्रभावी होती है। क्लोज रेंज फायर में इसकी मारक क्षमता अधिक होती है और टारगेट के बचने की संभावना कम रहती है। ऑन द स्पॉट कन्फर्म किल पूरी वारदात को अपराध जगत में ऑन द स्पॉट कन्फर्म किल के तौर पर देखा जा रहा है, जहां शूटर ने पहले टारगेट को लॉक किया, फिर नजदीक पहुंचकर फायर किया और बिना समय गंवाए निकल गया। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि तकनीकी और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर जांच जारी है। सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन और अन्य इनपुट के आधार पर शूटरों की पहचान की कोशिश की जा रही है।
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