सामाजिक-सांस्कृतिक पदों पर धर्मांतरित आदिवासी नहीं बने रह सकते: निशा उरांव
गुमला में आदिवासी समाज के अगुओं ने पारंपरिक व्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण के लिए उपायुक्त को ज्ञापन सौंपा। उन्होंने बाहरी हस्तक्षेप रोकने और ग्राम सभा व्यवस्था लागू करने की मांग की। धर्मांतरित आदिवासी समाज की जिम्मेदारियों के कारण सांस्कृतिक नुकसान की बात कही गई।

गुमला, संवाददाता। आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था,धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण को लेकर शुक्रवार को जिले के पारंपरिक आदिवासी अगुओं ने समिति की संरक्षक निशा उरांव के नेतृत्व में उपायुक्त दिलेश्वर महतो को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन के माध्यम से पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में बाहरी हस्तक्षेप रोकने तथा पांचवीं अनुसूची के अनुरूप ग्राम सभा व्यवस्था लागू करने की मांग की गई।
पारंपरिक व्यवस्थाओं की रक्षा
इस बाबत संरक्षक निशा उरांव ने बताया कि आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्थाओं जैसे पड़हा,डोकलो सोहर व अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक पदों पर धर्मांतरित आदिवासी नहीं बने रह सकते। प्रतिनिधियों का कहना है कि इन पदों से धार्मिक और सामाजिक दोनों प्रकार की जिम्मेदारियां जुड़ी होती हैं। धर्मांतरित व्यक्ति सामाजिक दायित्व निभा सकता है,लेकिन धार्मिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाता, जिससे आदिवासी मूल आस्था और संस्कृति को नुकसान पहुंच रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का हवाला
इस संबंध में उन्होने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का भी हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य निर्णय के अनुसार ग्राम सभा की अनुमति के बिना चंगाई सभा आयोजित नहीं की जा सकती। साथ ही नई पेसा नियमावली में ग्राम सभाओं पर अध्यक्ष,सचिव और कोषाध्यक्ष जैसे गैर-पारंपरिक पद थोपे जाने पर आपत्ति जताई गई।
पदों का निर्धारण
प्रतिनिधियों ने मांग की कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्र की ग्राम सभाओं में पदों का निर्धारण पारंपरिक नियमों के अनुसार ही किया जाए। ज्ञापन सौंपने वालों में अध्यक्ष महादेव मुंडा,सदस्य सचिव पुरन मुंडा समेत विभिन्न पारंपरिक पड़हा एवं प्रार्थना सभा से जुड़े कई प्रतिनिधि शामिल थे।
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