Why did the situation of fundamentalist Jamaat deteriorate in Bangladesh election Awami League is also a big factor बांग्लादेश के चुनाव में कट्टरपंथी जमात की क्यों खराब हो गई हालत, आवामी लीग भी बड़ा फैक्टर, International Hindi News - Hindustan
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बांग्लादेश के चुनाव में कट्टरपंथी जमात की क्यों खराब हो गई हालत, आवामी लीग भी बड़ा फैक्टर

बांग्लादेश केचुनाव में पहली बार जमात-ए-इस्लामी ने इतना बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। हालांकि उसके हाथ केवल निराशा ही लगी। वह अपनी कट्टरपंथी छवि को मिटा नहीं सका। वहीं आवामी लीग के वोटर भी बीएनपी की तरफ शिफ्ट हो गए। 

Sat, 14 Feb 2026 07:01 AMAnkit Ojha लाइव हिन्दुस्तान
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बांग्लादेश के चुनाव में कट्टरपंथी जमात की क्यों खराब हो गई हालत, आवामी लीग भी बड़ा फैक्टर

बांग्लादेश के आम चुनाव में तारिक रहमानी की अगुआई वाली बीएनपी ने दो तिहाई बहुमत से बड़ी जीत दर्ज की है। वहीं आवामी लीग की अनुपस्थिति में बीएनपी को टक्कर देने और सत्ता तक पहुंचने का सपने देखने वाली जमात-ए-इस्लामी का सपना चूर-चूर हो गया। जमात ने 11 दलों के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। हालांकि उसे 68 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। जमात ए इस्लामी ने चुनावी प्रक्रिया और परिणामों पर सवाल उठाए हैं। जमात ने गिनती वाले दिन भी कहा था, हम चुनाव की प्रक्रिया से संतुष्ट नहीं हैं लेकिन सभी को धैर्य रखना है।

पहली बार दिखाई थी हिम्मत

चुनाव परिणाम स्पष्ट होते ही भारत, पाकिस्तान और अमेरिका ने तारिक रहमान को जीत की बधाई दे दी। बता दें कि 2024 में जब शेख हसीना की सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हुए तो इमसें जमात-ए-इस्लामी सबसे आगे थी। उसने आवामी लीग की सरकार को गिराने में बड़ी भूमिका निभाई। पहली बार था जब आवामी लीग के ना होने की वजह से जमात-ए-इस्लामी इतने बड़े स्तर पर चुनाव लड़ रहा था। वरना उसकी स्थिति एक छोटी पार्टी के तौर पर ही होती थी।

युवाओं ने किया बीएनपी को वोट

जुलाई के प्रदर्शन में शामिल युवाओं और उनसे प्रेरित अन्य लोगों ने जमात की जगह बीएनपी को ही वोट किया है। जमात को उम्मीद थी कि महिला वोटर उसकी तरफ शिफ्ट होंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यहां तक कि अल्पसंख्यक समुदाय भी बीएनपी के ही पीछे हो लिया। आवामी लीग के वोटर जमात की तरफ ना जाकर सीधे बीएपी की ओर चले गए। ऐसे में जमात को करारी हार का सामना करना पड़ा और बीएनपी को फायदा हुआ।

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अमेरिकी फैक्टर

अमेरिका और जमात के बीच संबंध की खबरों के बीच भी उसे अच्छा खासा नुकसान हुआ। वॉशिंगटन पोस्ट में खबर छपी थी कि अमेरिकी डिप्लोमैट जमात के साथ संपर्क करना चाहते हैं। बीएनपी ने आरोप लगाया कि जमात ने गुप्त तरीके से अमेरिका के साथ समझौता कर लिया है। ऐसे में उसकी सरकार बनते ही बांग्लादेश की शांति और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा खड़ा हो जाएगा। वहीं पश्चिमी डिप्लोमैट्स के साथ बैठक के बाद जमात ने भी इसकी जानकारी दी।

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कट्टरपंथी छवि मिटाने में नाकामयाब

1941 में ही जमात-ए-इस्लामी का गठन हुआ था। इसने 1971 में बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था और पाकिस्तान का पक्ष लिया था। जमात ने रजाकार, अल-बद्र औऱ अल शम्स जैसे संगठन बनाए थे जो कि लाखों नागरिकों की हत्या करने वाले थे। इन संगठनों ने अल्पसंख्यकों का कत्ल-ए-आम किया। आजादी के बाद 1972 में पार्टी पर बैन लगा दिया जो कि 1979 में फिर से हटा लिया गया। बाद में जमात ने बीएनपी के साथ गठबंधन भी किया।

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2009 से 2024 तक शेख हसीना की सरकार में जमात के नेताओं पर शिकंजा कसा गया और कई लोगों को फांसी भी दी गई। हालांकि उसकी छात्र इकाई इस्लामी छात्र शिविर ऐक्टिव थी। 15 साल तक जमात राजनीतिक रूप से वंचित रहा। इस बार के चुनाव में उसने महिलाओं और अल्पसंख्यकों की बात करके खुद की रीब्रैंडिंग करने की कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहा।

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