सीजफायर पर कौन सच बोल रहा, अमेरिका या ईरान? पाकिस्तान की भूमिका पर भी सवाल
इस पूरे प्रकरण में पाकिस्तान का पीसमेकर बनकर उभरना और ट्रंप का अपनी ही धमकियों से पीछे हट जाना, कई सवाल खड़े करता है। क्या अमेरिका वाकई अपनी रणनीति बदल रहा है या यह केवल नए सिरे से हमले की तैयारी के लिए समय जुटाने की कोशिश है?

iran us ceasefire: अमेरिका और ईरान के बीच अचानक हुए संघर्ष विराम के फैसले ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में हलचल तेज कर दी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे शांति की दिशा में एक बड़ा कदम बता रहे हैं, वहीं एक्सपर्ट्स इसे असामान्य और अवास्तविक करार दे रहे हैं। वाशिंगटन स्थित फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज (FDD) के कार्यकारी निदेशक और अमेरिकी ट्रेजरी के पूर्व आतंकवाद निरोधी विश्लेषक जोनाथन शांजर ने इस समझौते की विश्वसनीयता और इसकी शर्तों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जोनाथन शांजर ने सबसे पहले इस समझौते के सूत्रधार पाकिस्तान की भूमिका पर हैरानी जताई है। उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक बेहद अजीबोगरीब मोड़ बताया।
शांजर के अनुसार, "यह समझना जरूरी है कि यह सौदा पाकिस्तान द्वारा कराया गया है। यह बहुत ही असामान्य है कि एक ऐसा देश, जो पारंपरिक रूप से आतंकवाद का प्रायोजक रहा है वह अब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध रोकने के लिए हस्तक्षेप कर रहा है।" शांजर ने आगे कहा कि पाकिस्तान द्वारा इस समय इतनी बड़ी कूटनीतिक सक्रियता दिखाने के पीछे के असल कारण अभी तक पूरी तरह अस्पष्ट हैं।
जोनाथन शांजर कहते हैं, “हम जानते हैं कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस विदेशी दखल को अच्छी नजर से नहीं देखते और मुझे लगता है कि वह शुरू से ही इस युद्ध को लेकर बहुत चिंतित रहे हैं। लेकिन मुझे लगता है कि चीन का सवाल ही असल में सबसे दिलचस्प है। जब हम पाकिस्तान की तरफ देखते हैं तो हमें यह समझना होगा कि यह एक ऐसा देश है जो चीन का बहुत ज्यादा कर्जदार है। सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अमेरिका के साथ मिलकर शायद कुछ नए दोस्त बनाने और दुनिया भर में अपने गठबंधन का दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रहा है? या वे चीन के इशारों पर चल रहा है? क्या वह असल में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र है? किसी तरह पाकिस्तानी वाइट हाउस में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गए हैं। यह कैसे हुआ और इसके बदले में वे क्या चाहते हैं, इस बारे में अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं मिला है।”
कौन सच बोल रहा है?
इस संघर्ष विराम की सबसे बड़ी चिंता दावों का विरोधाभास है। शांजर ने कहा कि वाशिंगटन और तेहरान, दोनों इस समझौते की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं। ईरान इसे अमेरिका के पूर्ण आत्मसमर्पण के रूप में पेश कर रहा है। ईरान का कहना है कि अमेरिका सभी प्रतिबंध हटाने, पश्चिम एशिया छोड़ने और युद्ध के हर्जाने का भुगतान करने के लिए सहमत हो गया है। दूसरी ओर, अमेरिका कह रहा है कि यह केवल दो सप्ताह का युद्धविराम है, जो इस शर्त पर आधारित है कि ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोल दे।
शांजर ने ईरान के दावों को अवास्तविक बताते हुए सवाल उठाया कि क्या ईरान वास्तव में होर्मुज में जहाजों की मुक्त आवाजाही की अनुमति देगा?
ईरान की 10-सूत्रीय शर्तें:
- ईरान पर आक्रामण नहीं
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान का फुल कंट्रोल
- सभी प्राथमिक प्रतिबंधों को हटाना होगा
- सभी सेकेंडरी प्रतिबंधों को हटाना होगा
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी प्रस्तावों को समाप्त करना होगा
- IAEA बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सभी प्रस्तावों को समाप्त करना होगा
- ईरान को मुआवजे का भुगतान करना होगा
- युद्ध क्षेत्र से अमेरिकी लड़ाकू सेनाओं की वापसी
- लेबनान के वीर इस्लामी प्रतिरोध सहित सभी मोर्चों पर युद्ध की समाप्ति
भड़क सकता है युद्ध
विश्लेषकों का मानना है कि यह दो सप्ताह का समय एक स्थायी समाधान खोजने के लिए दिया गया है, लेकिन यह समय खतरों से खाली नहीं है। शांजर ने चेतावनी दी है कि इस समझौते की नींव बहुत कमजोर है। उन्होंने कहा, "हमारे पास संभावित रूप से दो सप्ताह का संघर्ष विराम है, लेकिन इस शुरुआती दौर में अभी भी बहुत कुछ गलत होने की संभावना है।" विशेषज्ञों का डर है कि यदि जमीन पर दोनों सेनाओं के बीच कोई छोटी सी भी गलतफहमी हुई तो यह युद्ध और अधिक विनाशकारी रूप में वापस लौट सकता है।
इस पूरे प्रकरण में पाकिस्तान का पीसमेकर बनकर उभरना और ट्रंप का अपनी ही धमकियों से पीछे हट जाना, कई सवाल खड़े करता है। क्या अमेरिका वाकई अपनी रणनीति बदल रहा है या यह केवल नए सिरे से हमले की तैयारी के लिए समय जुटाने की कोशिश है? जोनाथन शांजर जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक दावों का यह विरोधाभास दूर नहीं होता, तब तक इसे एक सफल कूटनीति कहना जल्दबाजी होगी।
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