पाकिस्तान-अफगान संघर्ष से बढ़ेगी आसिम मुनीर की शक्ति, शहबाज शरीफ का कटेगा पत्ता?
पाकिस्तान की तरफ से किए गए हवाई हमलों के बाद अफगान तालिबान ने पलटवार करना शुरू कर दिया है। तालिबान की तुलना में मजबूत दिख रही पाकिस्तानी वायुसेना भले ही आसमान पर हावी हो, लेकिन जमीन पर पश्तून लड़ाकों का सामना करना उनके लिए आसान नहीं है।

Pakistan Afghanistan war update: भारत के खिलाफ आतंकी हमले और फिर उसके बाद संघर्ष को शुरू करके आसिम मुनीर पहले ही पाकिस्तानी सत्ता के गलियारों में अपनी ताकत को बढ़ा चुके हैं। अब पाकिस्तानी सेना द्वारा अफगानिस्तान के ऊपर खुला युद्ध घोषित करना इस बात को उजागर करता है कि पाकिस्तान अब एक सुरक्षा राज्य में बदल चुका है, जो अपने पड़ोसियों के साथ बातचीत के जरिए मुद्दे के बजाय सैन्य ताकत का इस्तेमाल करना ज्यादा पसंद करता है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद अपनी जीत के झूठ को परोसकर फील्ड मार्शल का पद पा चुके आसिम मुनीर अब घरेलू टीटीपी की समस्या के लिए अफगान तालिबान को दोषी ठहराकर अपनी सत्ता को मजबूती देने में लगे हुए हैं।
तालिबान के दोबारा सत्ता में आने से पहले जब भी अफगान तालिबान को जरूरत पड़ी है, तब वह पाकिस्तान में ही शरण लेता हुआ दिखा है। चाहें सोवियत कब्जे का दौर हो या फिर अमेरिका के साथ युद्ध के दौरान का समय। भले ही मुशर्रफ खुले तौर पर अमेरिका के साथ वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हों, लेकिन उन्होंने हमेशा तालिबान के नेताओं को पाकिस्तान में जगह दी थी। ऐसे में अगर अभी भी पाकिस्तान की राजनैतिक नेता तालिबान के साथ बातचीत के जरिए मुद्दे सुलझाने की कोशिश करते, तो यह ज्यादा आसान होता, लेकिन इसके बजाय पाकिस्तानी प्रशासन ने काबुल, नंगहार और पक्तिका पर बमबारी करने वाला विकल्प चुना है। शहबाज शरीफ के नेतृ्त्व में कमजोर गठबंधन सरकार ने स्पष्ट रूप से पूरा मैदान मुनीर को सौंप दिया। मुनीर के लिए भी यह मौका एक संजीवनी की तरह है, क्योंकि सेना के लिए राजनीति करने का मौका तब तक बना रहेगा, जब तक पाकिस्तान युद्ध जैसी स्थिति में फंसा है या फिर उसे बाहरी खतरे का भय बना रहेगा।
अफगानिस्तान के साथ क्या हुआ?
पाकिस्तान लगातार अफगान तालिबान के ऊपर आरोप लगाता आ रहा है कि वह पाकिस्तानी तालिबान को सपोर्ट करता है। इतना ही नहीं वह पाकिस्तानी तालिबान लड़ाकों को भी अपनी जमीन पर शरण दे रहा है। हालांकि अफगान तालिबान शुरुआत से ही इन आरोपों से इनकार करता रहा है। इसी क्रम में पाकिस्तान ने शुक्रवार सुबह ऑपरेशन गजब लिल-हक नाम से अफगानिस्तान की जमीन पर हमला बोल दिया। यह कार्रवाई कथित तौर पर गुरुवार को खैबर पख्तूनख्वा के चितराल, खैबर, मोहम्मद, कुर्रम और बाजौर सेक्टरों में सीमा के कई स्थानों पर अफगान तालिबान द्वारा की गई बिना उकसावे की गोलीबारी के जवाब में की गई।
पाकिस्तान टीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की सशस्त्र सेनाओं ने हवाई हमले किए और काबुल, कंधार तथा पक्तिया में अफगान तालिबान के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। पाकिस्तानी अखबार डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक इन झड़पों में दो सुरक्षाकर्मियों की जान गई है, जबकि 133 अफगान लड़ाकों की भी मौत हुई है।
पुरानी है पाकिस्तान और टीटीपी की लड़ाई
अभी के समय में पाकिस्तान भले ही अफगान तालिबान के ऊपर टीटीपी के लड़ाकों को पनाह देने का आरोप लगा रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि वह पाकिस्तान ही था, जिसने शुरुआती दौर में सुन्नी उग्रवादियों को पैदा करने में अहम भूमिका निभाई थी। यह पाकिस्तानी डीप स्टेट द्वारा ही पाले-पोसे और प्रशिक्षित किए गए थे। आज की हालत हिलेरी क्लिंटन के उस बयान की याद दिलाती है। कि 'अगर आप सांप को पालेंगे तो यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह केवल पड़ोसी को ही काटेगा।'पाकिस्तान द्वारा पाले गए यह उग्रवादी आज पाकिस्तान को ही काटने पर उतारू हैं।
अफगानिस्तान की तुलना में अपनी मजबूत वायुसेना की वजह से भले ही पाकिस्तान इस युद्ध में हावी हो, लेकिन जमीनी इलाकों में पश्तूनों का मुकाबला करना उसके लिए कभी भी आसान नहीं रहा। पश्तून पिछली दो सदियों से लगातार वैश्विक शक्तियों को हराने के लिए जाने जाते हैं। पाकिस्तानी आर्मी ने दशकों तक अपने लाभ के लिए इन्हीं पश्तूनों का इस्तेमाल किया, लेकिन अब पाकिस्तान को उसकी यह रणनीति बहुत भारी पड़ रही है। पश्तून अब लाहौर और रावलपिंडी के पंजाबी मुसलमानों के “पैदल सैनिक” नहीं बनना चाहते। तालिबान खुद को अफगानिस्तान की राष्ट्रवादी ताकत के रूप में पेश करता है, जिसे आईएसआई से टकराने और संघर्ष को रावलपिंडी तक ले जाने में कोई हिचक नहीं है।
आज पाकिस्तान अपने पूर्वी और पश्चिमी दोनों सीमाओं पर सैन्य दबाव में है। इससे केवल फील्ड मार्शल मुनीर की स्थिति मजबूत हो सकती है, लेकिन यह पाकिस्तान में बहुदलीय लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।
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