Iran War Closure of Strait of Hormuz exacerbates helium gas crisis threatens AI and MRI scans ईरान युद्ध से कच्चे तेल ही नहीं 'हीलियम गैस' पर भी संकट, MRI स्कैन से लेकर AI सिस्टम पर असर, International Hindi News - Hindustan
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ईरान युद्ध से कच्चे तेल ही नहीं 'हीलियम गैस' पर भी संकट, MRI स्कैन से लेकर AI सिस्टम पर असर

Strait of Hormuz: हीलियम को मुख्य रूप से दुनिया की सबसे हल्की गैस के रूप में जाना जाता है। मेडीकल क्षेत्र में एमआरआई मशीन में इसका प्रयोग किया जाता है। गैस की कमी होने की स्थिति में इलाज में देरी होने की आशंका है, जिससे वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली के ऊपर दबाव बढ़ सकता है।

Fri, 3 April 2026 06:11 PMUpendra Thapak लाइव हिन्दुस्तान
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ईरान युद्ध से कच्चे तेल ही नहीं 'हीलियम गैस' पर भी संकट, MRI स्कैन से लेकर AI सिस्टम पर असर

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने ग्लोबल सप्लाई चैन की पोल खोलकर रख दी है। होर्मुज पर लगे ईरानी प्रतिबंध ने कच्चे तेल और एलएनजी की 20 फीसदी वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित किया है। इसके साथ ही अब इस बंद का असर तकनीक, मेडीकल और सेमीकंडक्टर उद्योग में मुख्य रूप से उपयोग होने वाली हीलियम गैस की सप्लाई पर भी दिखने लगा है। बता दें, होर्मुज स्ट्रेट से वैश्विक हीलियम सप्लाई चैन का एक तिहाई हिस्सा निकलता है। अब युद्ध की स्थिति में यह भी प्रभावित हुआ है।

सेमीकंडक्टर, मेडीकल सेवाओं और एयरोस्पेस जैसे उद्योगों में उपयोग होने वाली हीलियम गैस को एलएनजी गैस को निकालने के दौरान प्राप्त किया जाता है। यह गैस बहुत ही हल्की होती है, जिसकी वजह से इसे स्टोर करके रखना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। इसे कैसी भी स्थिति में रखा जाए। यह धीरे-धीरे वातावरण में निकल जाती है। इसके बाद इसे वापस प्राप्त नहीं किया जा सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक वैश्विक स्तर पर हीलियम का मात्र 45 दिनों का बफर स्टॉक होता है। ऐसे में अगर होर्मुज जल्दी ही नहीं खुलता है, तो इससे होने वाली परेशानियां बढ़ने लगेंगी।

हीलियम के वैश्विक उत्पादन का 30 से 35 फीसदी कतर से प्राप्त

अमेरिका, इजरायल और ईरान की जंग में खाड़ी देशों पर भी लगातार हमले हुए हैं। ईरान ने पलटवार करते कतर के गैस फील्ड पर हमला किया है। इसकी वजह से एलएनजी उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसके साथ ही हीलियम गैस के उत्पादन पर भी असर पड़ा है। कतर हीलियम के वैश्विक उत्पादन का करीब 30 से 33 फीसदी हिस्सा बनाता है। अमेरिका और रूस जैसे देश भी हीलियम उत्पादन करते हैं। लेकिन इस गैस का हाल भी कच्चे तेल की तरह ही है। यह देश कतर के हीलियम की आपूर्ति को पूरा नहीं कर सकते।

हीलियम को मुख्य रूप से दुनिया की सबसे हल्की गैस के रूप में जाना जाता है। मेडीकल क्षेत्र में एमआरआई मशीन में इसका प्रयोग किया जाता है। गैस की कमी होने की स्थिति में लोगों के इलाज पर असर पड़ सकता है। लोगों के इलाज में देरी होने की आशंका है, जिससे वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली के ऊपर दबाव बढ़ सकता है।

सेमीकंडक्टर उद्योग को लग सकता है झटका।

एआई के समय में सेमीकंडक्टर की खपत लगातार बढ़ रही है। मुख्य रूप से ताइवान और अमेरिका जैसे देशों में फलने-फूलने वाले इस उद्योग में हीलियम गैस की उपयोगिता बहुत ज्यादा है। सेमीकंडक्टर के सटीक निर्माण के दौरान कूलिंग के लिए इसी गैस का उपयोग किया जाता है। अगर इस गैस की सप्लाई लगातार इसी तरीके से प्रभावित रहती है, तो चिप उत्पादन रुक सकता है। इसका प्रभाव स्मार्टफोन, डेटा सेंटर और एआई सिस्टम की सप्लाई पर भी पड़ेगा।

एयरोस्पेस उद्योग पर प्रभाव

हीलियम गैस इंसानों को केवल धरती ही नहीं, बल्कि आसमान में भी सुरक्षित रखने का काम करती है। अंतरिक्ष में बसने का सपना देख रहे इंसानों के लिए सबसे जरूरी रॉकेट्स ही हैं। इन रॉकेट्स के फ्यूल सिस्टम को प्रेसराइज करने के लिए हीलियम गैस का ही उपयोग किया जाता है। इसके अलावा लीकेट डिटेक्शन, फाइबर ऑप्टिक्स और वेल्डिंग जैसी इंडस्ट्रीज में भी इसका उपयोग महत्वपूर्ण है।

वैश्विक रिपोर्ट्स के मुताबिक इस वक्त होर्मुज स्ट्रेट के दोनों तरफ हजारों की संख्या में जहाज खड़े हुए हैं। इनमें से करीब 200 जहाज हीलियम सप्लाई चैन वाले हैं। लगातार बढ़ती मांग और आपूर्ति की कमी की वजह से कीमतें अपने उछाल पर हैं। अगर यह कमी लगातार बनी रहती है, तो सेमीकंडक्टर उद्योग को महंगी हीलियम खरीदने की क्षमता रखता है, लेकिन मेडीकल क्षेत्र में महंगाई बढ़ जाएगी। इसका सीधा असर आम आदमी के ऊपर होगा।

ईरान युद्ध ने वैश्विक सप्लाई चैन को पूरी तरह से खोलकर रख दिया है। एक होर्मुज संकट की वजह से आज पूरा विश्व वैश्विक मंदी के मुहाने पर खड़ा होकर, ऊर्जा संकट को झेल रहा है। अब अगर यह युद्ध बंद नहीं होता, तो जल्दी ही हीलियम का संकट भी पैदा होने लगेगा। मेडीकल , एयरोस्पेस और चिप इंडस्ट्रीज पर इसका असर लंबे समय तक रहेगा।

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