ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा के लिए क्यों आसान नहीं राह, खामेनेई से विरासत में मिली कई चुनौतियां
ईरान में 1979 की क्रांति के बाद का इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई थी, जिसे लाखों ईरानियों का समर्थन मिला था। लेकिन कई दशक के शासन के दौरान भ्रष्टाचार और दमन जैसे आरोपों ने इस समर्थन को कमजोर कर दिया है और आम लोगों का एक बड़ा हिस्सा इससे दूर हो गया।

Iran News: ईरान में अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता नियुक्त किया गया है। ईरानी मीडिया ने बताया है कि ईरान की ‘विशेषज्ञ परिषद’ ने सोमवार तड़के अयातुल्लाह सैय्यद मोजतबा खामेनेई को इस्लामिक क्रांति का तीसरा नेता घोषित किया है। मोजतबा इससे पहले किसी राजनीतिक पद पर नहीं रहे, लेकिन ईरान की राजनीति में उनका दबदबा रहा है। हालांकि अब उनके सामने कई चुनौतियां हैं।
मोजतबा की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब ईरान पर एक तरफ बाहरी हमले और दबाव बढ़ रहे हैं, वहीं देश के अंदर गुस्सा भी बढ़ता जा रहा है। पहले के नेता मौजूद कट्टर समर्थकों के मजबूत समूह पर भरोसा करते थे, लेकिन अब यह साफ नहीं है कि नया नेता भी उसी तरह उनका सहारा ले पाएगा या नहीं।
कौन हैं मोजतबा खामेनेई?
8 सितंबर 1969 को मशहद में जन्मे मोजतबा खामेनेई, अली खामेनेई के दूसरे बेटे हैं। 56 वर्षीय शिया धर्मगुरु खामेनेई ईरानी सत्ता के गलियारों में सबसे प्रभावशाली हस्तियों में से एक हैं और उन्हें शक्तिशाली 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' ( आईआरजीसी) का करीबी माना जाता है। ईरान की असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ने ईरानी लोगों से नए चुने गए नेता के पीछे खड़े होने और 'एकता बनाए रखने' का आग्रह किया है। वहीं इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने मोजतबा को इस पद पर चुने जाने का विरोध किया था।
करनी होगी कड़ी मशक्कत
अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद उनके कट्टरपंथी बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता बनने की दौड़ में सबसे आगे माना जा रहा था। हालांकि यह अब भी अनिश्चित है कि उन्हें पहले की तरह बड़ी संख्या में समर्थन मिलेगा या नहीं और क्या देश का एक बड़ा वर्ग मोजतबा के पीछे एकजुट होगा? रॉयटर्स ने अपनी एक रिपोर्ट में कुछ बासिज सदस्यों, आम ईरानियों, अधिकारियों, अंदरूनी सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषकों के हवाले से बताया है कि मोजतबा को इन चुनौतियों से पार पाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी। रिपोर्ट के मुताबिक इस्लामी गणराज्य को पहले जितना व्यापक समर्थन मिलता था, अब उसका आधार काफी छोटा हो चुका है।
ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट एंड्रूज के आधुनिक इतिहास के प्रोफेसर अली अंसारी के मुताबिक ईरान अगर नए नेता के तौर पर किसी कट्टरपंथी को चुनता है, तो मकसद समर्थकों के आधार को मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा, “लेकिन हकीकत यह है कि उनका समर्थक दायरा लगातार छोटा होता जा रहा है। यह जब तक चलता रहेगा, सिस्टम की पकड़ ढीली पड़ती जाएगी।”
घटता समर्थन
आखिरी राष्ट्रपति चुनाव में सबसे कट्टर उम्मीदवार सईद जलीली को पहले दौर में करीब 90 लाख और दूसरे दौर में करीब 1.3 करोड़ वोट मिले थे। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक उस साल ईरान की 8.5 करोड़ से ज्यादा आबादी में से 6.1 करोड़ लोग वोट देने के योग्य थे। कट्टरपंथियों का यह समर्थन ईरान की कुल आबादी के मुकाबले छोटा दिखाई देता है। वहीं लगातार हो रही बमबारी से देश में अराजकता का डर भी बढ़ गया है। अराक शहर के 34 साल के कारोबारी बाबक ने कहा, “गार्ड्स और सिस्टम अब भी शक्तिशाली हैं। उनके पास हजारों लड़ाके हैं जो इस शासन को बचाने के लिए लड़ने को तैयार हैं। लेकिन हमारे जैसे आम लोगों के पास कुछ भी नहीं है।”
इस्लामी शासन के प्रति असंतोष
गौरतलब है कि ईरान में 1979 की क्रांति के बाद इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई थी, जिसे लाखों ईरानियों का समर्थन मिला था। हालांकि कई दशक के शासन के दौरान भ्रष्टाचार, दमन और खराब मैनेजमेंट के आरोपों ने इस समर्थन को कमजोर कर दिया और आम लोगों का एक बड़ा हिस्सा इससे दूर हो गया। इसके बावजूद कट्टर समर्थकों का एक मजबूत समूह अब भी मौजूद है। ये लोग बेहद संगठित हैं और जरूरत पड़ने पर जल्दी जुट सकते हैं। इसलिए अमेरिका या इजरायल की ओर से शासन परिवर्तन की किसी भी कोशिश के सामने वे बड़ी बाधा बन सकते हैं।
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