PM मोदी को फोन लगाओ... ईरान युद्ध खत्म करने के लिए पूर्व US सैन्य अधिकारी की ट्रंप को सलाह
War iran israel: पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रही जंग पर पूर्व यूएस सैन्य अधिकारी ने पीएम मोदी की मध्यस्थता की वकालत की है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को पीएम मोदी को फोन करके ईरान और इजरायल से बात करने और मध्यस्थता करने के लिए कहना चाहिए।

Iran Israel US war update: अमेरिका और इजरायल द्वारा मिलकर ईरान पर किए गए हमले ने पूरे पश्चिम एशिया को संघर्ष की स्थिति में झोंक दिया है। अमेरिका और इजरायल के हमलों से तेहरान समेत पूरे ईरान में अफरा-तफरी मची हुई है, तो वहीं ईरान के पलटवार से खाड़ी क्षेत्र के तमाम देश लगातार असुरक्षा में घिरे हुए हैं। होर्मुज स्ट्रेट पर शुरू हुई नाकेबंदी की वजह से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और एलपीजी की कमी से एशिया के तमाम देश अब परेशानी की स्थिति में आ गए हैं। इस युद्ध को जल्दी समाप्त करने की वकालत कर रहे लोगों में से एक पूर्व अमेरिकी सैन्य अधिकारी डगलस मैकग्रैगर ने कहा है कि बातचीत के बीच हमला करके अमेरिका ने अपनी छवि को नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में अब भारतीय प्रधानमंत्री मोदी को फोन करके मध्यस्थता के लिए कहना चाहिए, क्योंकि उनके ईरान और इजरायल दोनों से बेहतर संबंध हैं।
टकर कार्लसन पॉडकास्ट में इस युद्ध पर बातचीत करते हुए डगलस ने कहा कि अमेरिका के लिए ईरान की सत्ता को परिवर्तित करना बिल्कुल भी आसान नहीं है। हम वायु सेना और नौसेना के जरिए हमला करके इस युद्ध को ज्यादा समय तक नहीं चला सकते हैं, और अगर यह चलता भी है, तो इसमें बहुत ज्यादा नुकसान है। इसलिए हमें जल्दी ही मध्यस्थता की तरफ देखना होगा। हालांकि, डगलस ने कहा कि अमेरिका के पहले हमले में खामेनेई और उनके परिवार के कई सदस्य मारे गए हैं। ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि अब जो नए सुप्रीम लीडर बने हैं, उनकी पत्नी, मां, पिता और एक बेटा या बेटी भी इस हमले में मारे गए। अब जबकि ऐसा इंसान वहां का सुप्रीम लीडर बना है, तो वह आपसे नफरत ही करेगा।
कार्लसन ने शांति और मध्यस्थता पर जोर देते हुए न्यूट्रल राष्ट्र के तौर पर भारत की वकालत की। उन्होंने कहा, "मध्यस्थता के लिए राष्ट्रपति ट्रंप को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन करना चाहिए। मोदी के इजरायल और ईरान दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं। ईरान और भारत के बीच में भी कभी दुश्मनी नहीं रही है, यहां तक कि शिया समुदाय से भी भारत की कोई दुश्मनी नहीं है। ऐसे में मोदी यहां पर मध्यस्थता कर सकते हैं। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप को यह देखना पड़ेगा कि आखिर वह ईरान और इजरायल को किस मुद्दे पर बातचीत के लिए आमंत्रित करते हैं। क्योंकि इस युद्ध के बाद खाड़ी क्षेत्र में न केवल अमेरिका बल्कि इजरायल के लिए भी नफरत बहुत बढ़ गई है। इसे कम करने के लिए हमें इस युद्ध को जल्दी ही खत्म करना होगा।"
अमेरिका पीछे हटा तो, इजरायल क्या करेगा?
डगलस ने इस युद्ध के लिए अमेरिका से ज्यादा इजरायल पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि इजरायल शुरुआत से ही अमेरिका को ईरान के खिलाफ ऐक्शन लेने के लिए कह रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अगर इस युद्ध में पीछे हटता भी है, तो सबसे बड़ा सवाल होगा कि नेतन्याहू क्या करेंगे, क्या वह पीछे हटेंगे? या फिर वह और भी ज्यादा बड़ा हमला करने की तरफ जाएंगे। डगलस ने कहा, "आखिर हम एक ऐसे देश के बारे में बात कर रहे हैं, जो यह मानने से भी इनकार करता है कि उसके पास परमाणु हथियार है। भले ही इजरायल की तरफ से ज्यादा तस्वीरें नहीं आ रही हैं, लेकिन इस युद्ध में इजरायल भी बड़े स्तर पर निशाना बनाया जा रहा है।"
स्कूल के बुली की तरह दिख रहा अमेरिका: डगलस
पूर्व सैन्य अधिकारी ने कहा कि पिछले प्रशासन कोई बड़ा निर्णय लेने से पहले अपने सहयोगी देशों के साथ बातचीत करती थीं। लेकिन इस हमले के पहले ट्रंप प्रशासन ने कोई बता नहीं की। उन्होंने कहा, "आज आप (ट्रंप प्रशासन) कह रहे हैं कि अमेरिका की तेल और गैस की आपूर्ति निर्बाध रूप से जारी है। ठीक है... क्या आप भूल रहे हैं कि भारत यहां से 60 फीसदी से ज्यादा आयात करता है, जापान आयात करता है, चीन आयात करता है, दक्षिण कोरिया भी अपनी ज्यादातर तेल जरूरतों को यहीं से पूरा करता है। क्या आपने हमला करने से पहले इन देशों से सलाह ली थी? नहीं आपने नहीं ली थी, यही वजह है कि आज यह देश परेशान हैं। अमेरिका, स्कूल के उस बुली बच्चे की तरह व्यवहार कर रहा है, जो सभी को परेशान करता रहता है, अंत में उसका क्या होता है, सभी उसके खिलाफ एकसाथ उठ खड़े होते हैं।"
डगलस ने इसके साथ ही अमेरिकी सैनिकों की ईरान में उतरने की संभावना से भी इनकार किया। उन्होंने कहा कि इजरायल के हाइफा पोर्ट को निशाना बनाया गया है। वायुसेना और नौसेना को एकदम से पीछे हटाया जा सकता है, लेकिन अगर सैनिक जमीन पर आ जाते हैं, तो फिर स्थिति और भी ज्यादा बिगड़ जाएगी। खाड़ी क्षेत्र में सैनिकों की तैनाती उन्हें वहां पर मिसाइलों को निशाने पर ले आएगी। अगर यह कदम उठाया जाता है, तो बहुत बड़ी गलती होगा।
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