युद्ध से EXIT का रास्ता तलाश रहे ईरान और US, शांति दूत बनने की फिराक में पाक; भारत के लिए क्या?
ईरान का कट्टरपंथी शासन इसे अपनी जीत के रूप में पेश करेगा क्योंकि वे सत्ता में बने रहने में सफल रहे हैं और उनके शासन का पतन नहीं हुआ है। हालांकि, देश की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।

पिछले 40 दिनों से मिडिल ईस्ट को दहलाने वाले भीषण युद्ध के अब शांत होने के संकेत मिल रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि ईरान के साथ शांति वार्ता कल ही इस्लामाबाद में फिर से शुरू हो सकती है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे दबाव के बीच अमेरिका अब इससे निकलने के लिए एक सम्मानजनक रास्ते की तलाश में है।
अमेरिकी प्रशासन का मुख्य उद्देश्य स्ट्रेट हॉर्मुज (Strait of Hormuz) में जहाजों की आवाजाही स्वतंत्र सुनिश्चित करना है, ताकि दुनिया में जारी तेल संकट खत्म हो सके।
आपको बता दें कि पाकिस्तान में वार्ता का पहला दौर विफल हो चुका है। ईरान की परमाणु प्रतिबद्धता की कमी के कारण यह विफल रहा था। हालांकि, हकीकत यह है कि 28 फरवरी से जारी अमेरिकी और इजरायली बमबारी ने ईरान के परमाणु बुनियादी ढांचे को मलबे में तब्दील कर दिया है। 2015 के JCPOA समझौते और NPT का हस्ताक्षरकर्ता होने के बावजूद ईरान के पास अब परमाणु हथियार विकसित करने की भौतिक क्षमता लगभग शून्य बची है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान को फिर से यूरेनियम संवर्धन की स्थिति में आने में कम से कम एक दशक का समय लगेगा।
दोनों पक्ष करेंगे जीत का दावा
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों पक्ष अब इस युद्ध से सम्मानजनक तरीके से बाहर निकलने की तैयारी कर रहे हैं। अमेरिका इसे अपनी बड़ी जीत बताएगा क्योंकि उसने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को ट्रंप के शब्दों में कहे तो पाषाण युग में धकेल दिया है। उसकी सेना को तबाह कर दिया है और शीर्ष नेतृत्व को निष्प्रभावी कर दिया है।
ईरान का कट्टरपंथी शासन इसे अपनी जीत के रूप में पेश करेगा क्योंकि वे सत्ता में बने रहने में सफल रहे हैं और उनके शासन का पतन नहीं हुआ है। हालांकि, देश की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।
पाकिस्तान की दोहरी चाल और भारत की चिंता
इस पूरे परिदृश्य में सबसे विरोधाभासी भूमिका पाकिस्तान की रही है। 1990 के दशक में चीन की मदद से ईरान को परमाणु तकनीक और सेंट्रीफ्यूज देने वाला पाकिस्तान अब वैश्विक शांतिदूत की भूमिका निभा रहा है। इस मध्यस्थता के जरिए पाकिस्तान अपनी छवि एक आतंकवादी देश से बदलकर पीसमेकर के रूप में स्थापित कर रहा है। वह इस कूटनीतिक सफलता का उपयोग ट्रंप प्रशासन, चीन और खाड़ी देशों से सैन्य और आर्थिक मदद हासिल करने के लिए करेगा।
भारतीय रणनीतिकारों का मानना है कि फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का असली लक्ष्य भारत है। पाकिस्तान इस शांति वार्ता के जरिए सऊदी अरब और कतर जैसे देशों के साथ अपनी निकटता बढ़ाएगा और उस प्रभाव का इस्तेमाल भारत के खिलाफ अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने में करेगा।
मोदी-ट्रंप संवाद
मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच लगभग 40 मिनट तक फोन पर बातचीत हुई। दोनों नेता ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोकने और हॉर्मुज को मुक्त रखने के मुद्दे पर एकमत हैं। भारत उन खाड़ी देशों की सुरक्षा को लेकर भी चिंतित है, जिन्हें ईरान ने अमेरिका का समर्थन करने के कारण निशाना बनाया है।
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