कैसा था 1979 से पहले का ईरान? आज के इस्लामिक कट्टरपंथ से कैसे था एकदम अलग चमकता मॉडर्न देश
पहलवी काल में ईरान ने तेल की कमाई के दम पर तेज आर्थिक विकास किया था। तेहरान जैसे शहरों को उस समय मिडिल ईस्ट का मॉडर्न चेहरा कहा जाता था, जहां ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें, सिनेमा हॉल, पश्चिमी कपड़े और खुला सामाजिक माहौल आम बात थी।

पश्चिमी एशिया का शिया बहुल इस्लामिक देश ईरान आज इजरायली और अमेरिकी हमलों में धुआं-धुआं हो रहा है। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद वहां इस्लामिक कट्टरपंथ के खात्मे के आसार हैं। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से इस देश में नई इस्लामी सरकार बनी थी, जिसने कई तरह के कट्टर प्रतिबंध लगाए थे। 1979 की ईरानी क्रांति से पहले, ईरान पर शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था। रजा पहलवी अमेरिका के करीबी सहयोगी थे। 1979 में रजा शाह को देश छोड़ना पड़ा था, जिसके बाद अयातोल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने देश की कमान संभाली थी।
1979 से पहले पहलवी के शासनकाल में ईरान एक आधुनिक और पश्चिमी रंग में रंगा हुआ देश था। उस समय का ईरान आज के ईरान से बिल्कुल अलग था। तब ईरान एक आधुनिक देश था, जहां महिलाओं की कई किस्म की आजादी हासिल थी। महिलाएं पश्चिमी कपड़े जैसे मिनी स्कर्ट पहन सकती थीं। तब आज की तरह हिजाब पहनना अनिवार्य नहीं था, बल्कि कुछ समय के लिए इस पर प्रतिबंध भी लगा था। वे पुरुषों के साथ घुल-मिल सकती थीं, गाड़ी चला सकती थीं और उच्च पदों पर तैनात थीं।

शहरों में था नाइट क्लब, सिनेमा हॉल
इतना ही नहीं पहलवी ने 1963 में 'सफेद क्रांति' के माध्यम से देश का तेजी से औद्योगीकरण और आधुनिकरण किया था। इस दौरान जमीन सुधार, महिलाओं को वोट का अधिकार और शिक्षा पर जोर दिया गया था। ईरान में तब साक्षरता दर बढ़ी थी और 1970 के दशक तक विश्वविद्यालयों में लगभग एक-तिहाई छात्र महिलाएं थीं।

तब तेहरान जैसे शहरों में नाइट क्लब, सिनेमा हॉल (जहाँ हॉलीवुड फिल्में चलती थीं) और पश्चिमी शैली के कैफे आम थे। शराब और सिगरेट पर कोई पाबंदी नहीं थी। ईरान अमेरिका और ब्रिटेन का सबसे करीबी सहयोगी था और उसे मिडिल ईस्ट का एक मजबूत सैन्य केंद्र माना जाता था।

मिडिल ईस्ट का मॉडर्न चेहरा कहलाता था तेहरान
पहलवी का शासनकाल 1941 से 1979 तक चला। इस दौरान ईरान ने तेल की कमाई के दम पर तेज आर्थिक विकास किया था। तेहरान जैसे शहरों को उस समय मिडिल ईस्ट का मॉडर्न चेहरा कहा जाता था, जहां ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें, सिनेमा हॉल, पश्चिमी कपड़े और खुला सामाजिक माहौल आम बात थी। इस चमक-धमक के पीछे शाह का शासन तानाशाही पूर्ण भी था। उनकी खुफिया एजेंसी 'सावाक' (SAVAK) विरोधियों का दमन करती थी। अमीर-गरीब के बीच खाई बहुत गहरी हो गई थी। ग्रामीण इलाकों के धार्मिक लोग इस तेजी से हो रहे पश्चिमीकरण से खुश नहीं थे। इसी असंतोष और धार्मिक पहचान खोने के डर ने ईरान में 1979 की क्रांति को जन्म दिया था।

पहले खुमैनी, फिर आए खामेनेई
1978-79 में देशभर में बड़े प्रदर्शन हुए। इस दौरान धार्मिक नेता अयातुल्लाह रूहोल्लाह खुमैनी, जो निर्वासन में थे, आंदोलन का चेहरा बनकर उभरे। जनवरी 1979 में शाह को देश छोड़कर भागना पड़ा। फरवरी 1979 में खुमैनी ईरान लौटे और कुछ ही महीनों में राजशाही खत्म कर दी गई। जनमत संग्रह के बाद ईरान को ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ घोषित किया गया। नई व्यवस्था में सर्वोच्च नेता (सुप्रीम लीडर) का पद बनाया गया, जो राष्ट्रपति से भी ऊपर है। खुमैनी पहले सुप्रीम लीडर बने। ईरानी क्रांति के बाद कई बड़े बदलाव हुए- जैसे- शरिया आधारित कानून लागू हुआ, महिलाओं के लिए हिजाब अनिवार्य कर दिया गया, पश्चिमी प्रभाव वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर रोक लगा दी गई। ईरान ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ सख्त रुख अपना लिया। अली खामेनेई खुमैनी के करीबी सहयोगी थे। 1981 में वे राष्ट्रपति बने। 1989 में खुमैनी की मौत के बाद संविधान में बदलाव कर खामेनेई को सुप्रीम लीडर चुना गया।
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